उलझन में हूँ

उलझन में हूँ

कुलदीप आज़ाद

मैं उलझन में हूँ, कुछ खोज रहा हूँ
क्या कोई मुझ पर या मैं किसी पर बोझ रहा हूँ

मैंने तो कभी, किसी का साथ न दिया
किसी ठोकर खाते को, संभालता हाथ न दिया
अपनी अंगुली पकड़ चलना सिखाया नहीं
कभी कांधे पर बैठा झुलाया नहीं
फिर कोई अंगुली दिखाए तो दिखाए
मैं ऐसे ग़ुस्से में, क्यों काँप रहा हूँ
क्या कोई मुझ पर या मैं किसी पर बोझ रहा हूँ

ख़ुशी से ग़म से वास्ता न रखा
जो घरों को जोड़े वो रास्ता न रखा
रिश्तों पर लगी धूल को हटाया नहीं
बहुत काँटे चुभे, पर किसी को बताया नहीं
बाहर मुस्कान है, अंदर दर्द ही दर्द
अपने दर्द से रिश्तों की धूल माँज रहा हूँ
क्या कोई मुझ पर या मैं किसी पर बोझ रहा हूँ

कभी कल्पना में, कभी हक़ीक़त में होता हूँ
कभी हँसता-मुस्कुराता हूँ, कभी रोता हूँ
कभी किसी रिश्ते को न प्यार दिया, न ख़ुशियाँ
कभी जला ही नहीं, फिर दीप क्यों कहेगी दुनिया
अंधेरे में मेरी रोशनी, जुगुनू-सी भी नहीं
इन्हीं प्रश्नों में फँसा, जवाब खोज रहा हूँ
क्या कोई मुझ पर या मैं किसी पर बोझ रहा हूँ

मैं चाहता हूँ, कोई मेरा अपना हो
वो हक़ीक़त हो, न कोई सपना हो
वो जो देते है साथ हर गली मोड़ पर
आएँ वापस यहाँ, वो जहाँ छोड़कर
उनकी एक झलक देखने को बेताब मैं
जो हो नहीं सकता- वो सोच रहा हूँ
क्या कोई मुझ पर या मैं किसी पर बोझ रहा हूँ

3 Responses to “उलझन में हूँ”

  1. 1
    deep narayan pandey Says:

    मैं उलझन में हूँ, कुछ खोज रहा हूँ
    क्या कोई मुझ पर या मैं किसी पर बोझ रहा हूँ
    nahi kuldeep na tum kisi per bojh ho na koi tum per lyo ki tum ek visaysh kaaam kay liy ish dharti per aaye ho.

  2. 2
    Kuldeep Azad Says:

    Deep Ji,

    Vo Vishesh kaam Kya hai

    Ye bhee Bata dijiye …!

    Jo kar raha hoon Vanha Time waste to

    Nahi ………!
    samya Rahte pata chale to achchha hi hai …!

  3. 3
    shubhra Says:

    आपकी भावनाएं जब भी शब्दों का आकार पाती है बेहतरीन कविता पैदा होती है। रचना संसार को आपका ये एहसान कम है क्या…

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