रचनाएँ

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गाँव-खेत-जंगल


जब कहीं चोट लगती है


अपनी आवाज़ ही सुनूँ कब तक


यथोचित


सागर का उपहास


एक नज़र में प्यार


छोड़ गाँव का घर


बच्चे अब हुशियार


होते ख़ुश माँ-बाप


बाबुल का रोग


बस इतनी रफ़्तार


एक क़दम की चूक से


जीवन है वो रेल


ग़ज़ब समय का फेर


सपने में भी दीखता अब मोबाइल फोन


गौतम-सा सन्यास


जैसा उसका संग


मेरे कुछ जज़्बात


उसी तरह के रंग


जो काँटों के पास थे