रचनाएँ

ख़तरे में इस्लाम हो नहीं सकता

कुँवर जावेद

वो जिसके जो भी हों मनसूबे अपने पास रखे
जो नेकनाम है बदनाम हो नहीं सकता
यहाँ की मिट्टी तो सबको गले लगाती है
यहाँ तो ख़तरे में इस्लाम हो नहीं सकता

VN:F [1.9.11_1134]
Rating: 7.4/10 (31 votes cast)
VN:F [1.9.11_1134]
Rating: +5 (from 9 votes)
No Comments »

ख़ुश्बू की खेती

कुँवर जावेद

हरेक धर्म का बस मूल बाँटने का है
तिलक के वास्ते गो-धूल बाँटने का है
यहाँ की मिट्टी में ख़ुश्बू की खेती होती है
यहाँ रिवाज़ तो बस फूल बाँटने का है

VN:F [1.9.11_1134]
Rating: 8.7/10 (13 votes cast)
VN:F [1.9.11_1134]
Rating: +4 (from 4 votes)
No Comments »

चिराग़ की लौ में कमी नहीं आती

कुँवर जावेद

वो चाहे कितना भी पानी समेट लो यारो
कभी भी गंगा की रौ में कमी नहीं आती
कि इक चिराग़ से जलते कई चिराग़ मग़र
किसी चिराग़ की लौ में कमी नहीं आती

VN:F [1.9.11_1134]
Rating: 8.4/10 (16 votes cast)
VN:F [1.9.11_1134]
Rating: +5 (from 5 votes)
2 Comments »

बम नहीं समझता है

कुँवर जावेद

वफ़ा की प्यार की सरगम नहीं समझता है
किसी भी देश का परचम नहीं समझता है
है कौन हिन्दू है सिख कौन और मुस्लिम क्या
ये हम समझते हैं ये बम नहीं समझता है

VN:F [1.9.11_1134]
Rating: 7.9/10 (8 votes cast)
VN:F [1.9.11_1134]
Rating: -1 (from 5 votes)
No Comments »

दिए से शहर जलाते हैं

कुँवर जावेद

हमेशा अपने लहू से ज़मीन सींचते थे
कि पतझरों में भी बनकर बहार आए हैं
दिए से शहर जलाते हैं आजकल कुछ लोग
बुज़ुर्गों ने तो दिए से दिए जलाए हैं

VN:F [1.9.11_1134]
Rating: 9.1/10 (10 votes cast)
VN:F [1.9.11_1134]
Rating: +2 (from 2 votes)
No Comments »

हम क्यों बहक रहे हैं

विष्णु सक्सेना

हमें कुछ पता नहीं है हम क्यों बहक रहे हैं
रातें सुलग रही हैं दिन भी दहक रहे हैं
जब से है तुमको देखा हम इतना जानते हैं
तुम भी महक रहे हो हम भी महक रहे हैं

VN:F [1.9.11_1134]
Rating: 7.2/10 (64 votes cast)
VN:F [1.9.11_1134]
Rating: +13 (from 17 votes)
No Comments »

सबसे बड़ा नमूना

कुँवर जावेद

निहत्थे लोग भी जंगल में शाम करते हैं
तो गाय-बैल के घर शेर काम करते हैं
ये शिव के होने का सबसे बड़ा नमूना है
कि मोर साँप को झुककर सलाम करते हैं

VN:F [1.9.11_1134]
Rating: 7.3/10 (9 votes cast)
VN:F [1.9.11_1134]
Rating: +5 (from 5 votes)
No Comments »

गाड़ी चली गई थी

विष्णु सक्सेना

डाली से रूठ कर के जिस दिन कली गई थी
बस उस ही दिन से अपनी क़िस्मत छली गई थी
अंतिम मिलन समझ कर उसे देखने गया तो
था प्लेटफॉर्म खाली गाड़ी चली गई थी

VN:F [1.9.11_1134]
Rating: 7.2/10 (34 votes cast)
VN:F [1.9.11_1134]
Rating: +9 (from 11 votes)
No Comments »

बाहर से नहीं आए हैं

कुँवर जावेद

किसी जादू किसी मंतर से नहीं आए हैं
एक दरिया हैं समंदर से नहीं आए हैं
हम कुँवर हैं कोई जावेद जो भी हैं लेकिन
इसी मिट्टी के हैं बाहर से नहीं आए हैं

VN:F [1.9.11_1134]
Rating: 7.7/10 (12 votes cast)
VN:F [1.9.11_1134]
Rating: +6 (from 8 votes)
1 Comment »

नींदें कहाँ से आएँ

विष्णु सक्सेना

अब भी हसीन सपने आँखों में पल रहे हैं
पलकें हैं बंद फिर भी आँसू निकल रहे हैं
नींदें कहाँ से आएँ बिस्तर पे करवटें ही
वहाँ तुम बदल रहे हो यहाँ हम बदल रहे हैं

VN:F [1.9.11_1134]
Rating: 7.5/10 (23 votes cast)
VN:F [1.9.11_1134]
Rating: +10 (from 12 votes)
1 Comment »

पुरखे नहीं बदल जाते

कुँवर जावेद

किसी के जाने से क़िस्से नहीं बदल जाते
तो सूर्य ढलने से साये नहीं बदल जाते
सुनो तो मिट्टी की ख़ुश्बू ये कह रही है कुछ
जगह बदलने से पुरखे नहीं बदल जाते

VN:F [1.9.11_1134]
Rating: 7.2/10 (5 votes cast)
VN:F [1.9.11_1134]
Rating: +5 (from 5 votes)
No Comments »

तुम हाथ थाम लेना

विष्णु सक्सेना

ओ जवान धड़कनों तुम, मेरा सलाम लेना
सीखा नहीं है मैंने, हाथों में जाम लेना
फ़िसलन बहुत है यारो, राहों में मुहब्बत की
कहीं मैं फिसल न जाऊँ, तुम हाथ थाम लेना

VN:F [1.9.11_1134]
Rating: 6.1/10 (16 votes cast)
VN:F [1.9.11_1134]
Rating: +8 (from 10 votes)
No Comments »

हम भी इसके हैं

कुँवर जावेद

ख़ुशी भी इसकी है और सारे ग़म भी इसके हैं
अजान-ओ-आरती वाले सनम भी इसके हैं
ये सब ही कहते हैं हिन्दोस्तां हमारा है
मग़र ये कोई नहीं कहता हम भी इसके हैं

VN:F [1.9.11_1134]
Rating: 7.4/10 (17 votes cast)
VN:F [1.9.11_1134]
Rating: +5 (from 7 votes)
No Comments »