रचनाएँ

Tag: Ghazal

और कुछ देर मुझे पास बिठाये रखिये


जाने कब से तरस रहे हैं


आजकल बज़्म में आते हुए डर लगता है


मेरे बढ़ने से जल गये हो तुम


इस अंतर में प्रभु रहते हैं


चांदनी से रात बतियाने सहेली आ गयी


हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है


ये क्या जगह है दोस्तो, ये कौन-सा दयार है


सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान-सा क्यूँ है


हद्द-ए-निगाह तक ये ज़मीं है सियाह फिर


दोस्तों की मेह्रबानी हो गई


आप आँखों में जब उतरते हैं


तुम्हारे प्यार के बिन


आपका मक़सद पुराना है मगर खंज़र नया


यूँ तो यारो थकान भारी है


आँखें भर आईं


बेटियाँ


बातें


इधर भटके, उधर भटके, भटक कर लौट आये हैं


सहमा-सहमा हर इक चेहरा