रचनाएँ

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चांदनी से रात बतियाने सहेली आ गयी


हिलता रहा मन


देहरी की क़िस्मत


ग़ुलाब हमारे पास नहीं


हद्द-ए-निगाह तक ये ज़मीं है सियाह फिर


वसंत (दो चित्र)


झूठ


मैं खुद को नहीं देखती औरों कि नज़र से


यूँ तो यारो थकान भारी है


मन आज़ाद नहीं है


मेरा नाम लिया जाएगा


बातें


ज़िन्दगी के पन्ने


तस्वीर अधूरी रहनी थी


एक पल के लिये मन द्रवित तो हुआ


एक नया आगाज़


मेरे मन-मिरगा नहीं मचल


सत्संग


दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा


खग उड़ते रहना जीवन भर