न्याय मिलता नहीं है
विवेक से
सत्य और असत्य के।
मिलता नहीं है वह दुरन्त
मानवीय भावना में
साक्षी-
केवल साक्षी है आधार
उसके आस्तित्व का
और बाज़ार पटे पड़े हैं
असंख्य अनाहूत साक्षियों से।
कितना सुलभ है न्याय
महंगाई के इस युग में।

विष्णु प्रभाकर