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अपने साहित्य में भारतीय वाग्मिता और अस्मिता को व्यंजित करने के लिये प्रसिद्ध रहे श्री विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून सन् 1912 को मीरापुर, ज़िला मुज़फ़्फ़रनगर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनकी शिक्षा-दीक्षा पंजाब में हुई। उन्होंने सन् 1929 में चंदूलाल एंग्लो-वैदिक हाई स्कूल, हिसार से मैट्रिक की परीक्षा पास की। तत्पश्चात् नौकरी करते हुए पंजाब विश्वविद्यालय से भूषण, प्राज्ञ, विशारद, प्रभाकर आदि की हिंदी-संस्कृत परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से ही बी.ए. भी किया।
विष्णु प्रभाकर जी ने कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, निबंध, एकांकी, यात्रा-वृत्तांत और कविता आदि प्रमुख विधाओं में लगभग सौ कृतियाँ हिंदी को दीं। उनकी ‘आवारा मसीहा’ सर्वाधिक चर्चित जीवनी है, जिस पर उन्हें ‘पाब्लो नेरूदा सम्मान’, ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ सदृश अनेक देशी-विदेशी पुरस्कार मिले। प्रसिद्ध नाटक ‘सत्ता के आर-पार’ पर उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा ‘मूर्तिदेवी पुरस्कार’ मिला तथा हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वार ‘शलाका सम्मान’ भी। उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के ‘गांधी पुरस्कार’ तथा राजभाषा विभाग, बिहार के ‘डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शिखर सम्मान’ से भी सम्मानित किया गया।
विष्णु प्रव्हाकर जी आकाशवाणी, दूरदर्शन, पत्र-पत्रिकाओं तथा प्रकाशन संबंधी मीडिया के विविध क्षेत्रों में पर्याप्त लोकप्रिय रहे। देश-विदेश की अनेक यात्राएँ करने वाले विष्णु जी जीवन पर्यंत पूर्णकालिक मसिजीवी रचनाकार के रूप में साहित्य-साधनारत रहे। 11 अप्रैल सन् 2009 को दिल्ली में विष्णु जी इस संसार से विदा ले गये।
लेखक के एकमात्र कविता संग्रह ‘चलता चला जाऊंगा’ से साभार।
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ग़ज़ल
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6 अप्रैल सन् 1961 को मध्य प्रदेश के नीमच ज़िले में जन्मे रमेश शर्मा वर्तमान समय के एक ऐसे सादा रचनाकार हैं, जिनकी सादगी उन्हें ख़ास बनाती है। गीत जैसी शास्त्रीय विधा को किस हद तक आम किया जा सकता है इसका अंदाज़ा रमेश शर्मा के गीतों को सुन-पढ़कर लगाया जा सकता है।
मरुथल से अभिशप्त राजस्थान जिस प्रकार अपनी तमाम विसंगतियों के बावजूद अपने वैभव के लिए विख्यात है उसी प्रकार जीवन के तमाम संघर्षों के बीच चिचित्तौड़गढ़ के छोटे से गाँव सेगवा के रमेश शर्मा अपने गीतों की सच्चाई और सादगी के लिए जाने जाते हैं।
कला विषयों से स्नातक करने वाले रमेश शर्मा के गीतों से गाँव की वह सौंधी ख़ुश्बू उठती है जो यकायक सबको जानी-पहचानी ही लगती है। दरअस्ल रमेश जी के गीतों में वह अनोखापन है जिसे भोगते तो सब हैं किन्तु पकड़ कोई नहीं पाता। रमेश जी ने इस अनोखेपन को बड़े भोलेपन से गीतों में पिरोया है यही कारण है कि वाचिक परंपरा की इक्कीसवीं सदी के परिप्रेक्ष्य में रमेश जी न केवल अपने गीतों की भव्यता लिए स्थापित हुए बल्कि लोकप्रियता के नए मापदण्ड भी तय किए।
संपर्क- गरिमा प्रोविज़न स्टोर, सेगवा हाउसिंग बोर्ड, सेगवा रोड, चित्तौड़गढ़, राजस्थान- 312025
दूरभाष- +91 9414249133
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ग़ज़ल
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7 जून 1970 को पिलखुवा (ग़ाज़ियाबाद) में जन्मे प्रवीण शुक्ल अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर तथा बी.एड. उपाधियाँ प्राप्त कर चुके हैं और पीएच.डी. शोध में संलग्न हैं तथा दिल्ली के एक विद्यालय में अर्थशास्त्र के व्याख्याता के रूप में सेवारत हैं। आपके पिता श्री ब्रज शुक्ल ‘घायल’ भी अपने काव्यकर्म के लिए जाने जाते हैं।
आप वर्तमान समय में हिंदी की वाचिक परंपरा के कवियों में अग्रिम पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं। हास्य, व्यंग्य, गीत, ग़ज़ल और अन्य तमाम विधाएँ आपके सृजन के दायरे में आती हैं। तमाम जनसंचार माध्यमों से आपकी रचनाएँ, शोधपत्र तथा साक्षात्कार प्रसारित-प्रकाशित हो चुके हैं। आपकी साहित्य-सेवा के लिए आपको विविध संस्थाओं ने लगभग दर्जन भर पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा है। इनमें वर्ष 1998 का हिंदी गौरव सम्मान, बर्ष 2004 का अट्टहास युवा रचनाकार सम्मान और वर्ष 2006 का ओमप्रकाश आदित्य सम्मान शामिल है। वर्ष 2010 के काका हाथरसी पुरस्कार की घोषणा आपके लिए की गई है। अब तक आपके चार काव्य संकलन ‘स्वर अहसासों के’; ‘कहाँ ये कहाँ वो’; ‘हँसते-हँसाते रहो’ और ‘तुम्हारी आँख के आँसू’ प्रकाशित हो चुके हैं। आपकी पुस्तक ‘गांधी और गांधीगिरी’ का गुजराती, अंग्रेजी तथा मराठी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। ‘सफ़र बादलों का’ शीर्षक से आपका यात्रा वृत्तांत भी पाठकों के लिए उपलब्ध है। आपने अनेक महत्वपूर्ण कृतियों का संपादन भी किया है जिनमें अल्हड़ बीकानेरी जी की रचनाओं का संकलन ‘हर हाल में ख़ुश हैं’ तथा संतोष आनंद जी के संकलन ‘इक प्यार का नग़मा है’ तथा ‘मुहब्बत है क्या चीज़!’ सम्मिलित हैं।
आपका ग़ज़ल संग्रह ‘आइना अच्छा लगा’ और व्यंग्य लेख संकलन ‘नेताजी का चुनावी दौरा’ शीघ्र प्रकाशित होने जा रहे हैं। आप विविध समाचार-पत्र तथ पत्रिकाओं में नियमित स्तंभ लिखते रहे हैं। आपने बैंकाक, मस्कट, दुबई, भूटान और यूनाइटेड किंग्डम जैसे देशों में अपनी काव्य-पताका फहराई है।
आपकी काव्य प्रतिभा के आधार पर आपके विषय में पद्मश्री गोपालदास ‘नीरज’ ने ‘तुम्हारी आँख के आँसू’ की भूमिका में लिखा है कि- “प्रवीण शुक्ल ने अपनी काव्य-प्रतिभा का जो स्वरूप प्रस्तुत किया है, उसे देखने के बाद मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूँ कि उनके पास नया सोच, नया कथ्य, नया बिम्ब सभी कुछ अनूठा है। यह युवा कवि आगे चलकर साहित्य-जगत को कोई ऐसी कृति अवश्य देगा जिससे वह स्वयं तो बड़ा कवि माना ही जायेगा, साथ ही उसकी इस कृति से साहित्य-जगत भी गौरवान्वित होगा।”
पता : 4649/15-ए, न्यू मॉडर्न शाहदरा, दिल्ली-110032
दूरभाष : 011-22111464
मोबाइल : +91 93126 00362
ई-मेल : kavipraveenshukla@rediffmail.com
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ग़ज़ल
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मार्च 1925 में उत्तार प्रदेश के मुरादाबाद ज़िले के संभल तहसील में जन्मे रामावतार त्यागी जी दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर तक शिक्षा ग्रहण करने वाले एक ऐसे हस्ताक्षर थे जिन्होंने हिन्दी गीत को एक नया मुक़ाम दिया। आपके गीतों के विषय में बालस्वरूप राही जी कहते हैं कि त्यागी की बदनसीबी यह है कि दर्द उसके साथ लगा रहा है, उसकी ख़ुशनसीबी यह है कि दर्द को गीत बनाने की कला में वह माहिर है। गीत को जितनी शिद्दत से उसने लिया है, वह स्वयं में एक मिसाल है। आधुनिक गीत साहित्य का इतिहास उसके गीतों की विस्तारपूर्वक चर्चा के बिना लिखा ही नहीं जा सकता।
रामधारी सिंह दिनकर आपके गीतों पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि त्यागी के गीतों में यह प्रमाण मौजूद है कि हिन्दी के नए गीत अपने साथ नई भाषा, नए मुहावरे, नई भंगिमा और नई विच्छिति ला रहे हैं। त्यागी के गीत मुझे बहुत पसन्द आते हैं। उसके रोने, उसके हँसने, उसके बिदकने और चिढ़ने, यहाँ तक कि उसके गर्व में भी एक अदा है जो मन मोह लेती है।
‘नया ख़ून’; ‘मैं दिल्ली हूँ’; ‘आठवाँ स्वर’; ‘गीत सप्तक-इक्कीस गीत’; ‘गुलाब और बबूल वन’; ‘राष्ट्रीय एकता की कहानी’ और ‘महाकवि कालिदास रचित मेघदूत का काव्यानुवाद’ जैसे अनेक काव्य संकलनों के साथ ही साथ ‘समाधान’ नामक उपन्यास; ‘चरित्रहीन के पत्र’; ‘दिल्ली जो एक शहर था’ और ‘राम झरोखा’ जैसी गद्य रचनाएँ भी आपके रचनाकर्म में शामिल हैं। अनेक महत्तवपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं का आपने जीवन भर सम्पादन किया।
हिन्दी फिल्म ‘ज़िन्दगी और तूफ़ान’ में मुकेश द्वारा गाया गया आपका गीत ‘ज़िन्दगी और बता तेरा इरादा क्या है’ ख़ासा लोकप्रिय हुआ। आपके गीत संवेदी समाज के बेहद एकाकी पलों के साथी हैं। 12 अप्रेल सन् 1985 को आप अपने गीत हमारे बीच छोड़कर हमसे विदा ले गए।
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27 मई 1985 को दिल्ली में जन्मे चिराग़ पत्रकारिता में स्नातकोत्तर करने के बाद ‘हिन्दी ब्लॉगिंग’ पर शोध कर रहे हैं। ब्लॉगिंग जैसा तकनीकी विषय अपनी जगह है और पन्नों पर उतरने वाली संवेदनाओं की चुभन और कसक की नमी अपनी जगह। कवि-सम्मेलन के मंचों पर एक सशक्त रचनाकार और कुशल मंच संचालक के रूप में चिराग़ तेज़ी से अपनी जगह बना रहे हैं।
चिराग़ की रचनाओं में निहित पात्र का निर्माण एक भारतीय मानस् की मानसिक बनावट के कारण हुआ है, जिसे पगने, फूलने में सैकड़ों वर्ष लगे हैं। एक स्थिर व्यक्तित्व का चेहरा, जिसका दर्शन हमें पहली बार इनकी रचनाओं में होता है।
एक चेहरे का सच नहीं, एक सच का चेहरा! जिसे चिराग़ ने गाँव, क़स्बों और शहरों के चेहरों के बीच गढ़ा है। औपनिवेशिक स्थिति में रहने वाले एक हिन्दुस्तानी की आर्कीटाइप छवि शायद कहीं और यदा-कदा ही देखने को मिले। एक सच्चा सच चिराग़ की रचनाओं में जीवन्त और ज्वलंत रूप में विद्यमान है कि उसकी प्रतिध्वनि सदियों तक सुनाई देगी।
चिराग़ की रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता है कि इनमें हिमालय-सी अटलता भी है और गंगा-सा प्रवाह भी। चिराग़ की रचनाओं के कॅनवास पर दूर तक फैला हुआ एक चिन्तन प्रदेश मिलता है, सफ़र का उतार-चढ़ाव नहीं, मील के पत्थर नहीं कि जिन पर एक क्षण बैठकर हम रचनाकार के पद-चिन्हों को ऑंक सकें कि कहाँ वह ठिठका था, कौन-सी राह चुनी थी, किस पगडंडी पर कितनी दूर चलकर वापस मुड़ गया था। हमें यह भी नहीं पता चलता कि किस ठोकर की आह और दर्द उसके पन्नों पर अंकित है।
चिराग़ की रचनाओं को पढ़कर लगता है कि वह ग़रीबी की यातना के भीतर भी इतना रस, इतना संगीत, इतना आनन्द छक सकता है; सूखी परती ज़मीन के उदास मरुथल में सुरों, रंगों और गंध की रासलीला देख सकता है; सौंदर्य को बटोर सकता है और ऑंसुओं को परख सकता है। किन्तु उसके भीतर से झाँकती धूल-धूसरित मुस्कान को देखना नहीं भूलता।
नई पीढ़ी का सटीक प्रतिनिधित्व कर रहे चिराग़ को पढ़ना, वीणा के झंकृत स्वरों को अपने भीतर समेटने जैसा है। इस रचनाकार का पहला काव्य-संग्रह ‘कोई यूँ ही नहीं चुभता’ जनवरी 2008 में प्रकाशित हुआ था। इसके अतिरिक्त चिराग़ के संपादन में ‘जागो फिर एक बार’; ‘भावांजलि श्रवण राही को’ और ‘पहली दस्तक’ जैसी कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। हाल ही में चिराग़ की रचनाएँ चार रचनाकारों के एक संयुक्त संकलन ‘ओस’ में प्रकाशित हुई हैं।
परिचय लेखक- नील
संपर्क- एच-24, पॉकेट-ए, आई एन ए कॉलोनी, नई दिल्ली- 110023
दूरभाष- +91 9868 573 612
ई मेल- chiragblog@gmail.com
चिराग़ जैन की रचनाएँ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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ग़ज़ल
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2 फरवरी सन् 1991 को दिल्ली में जन्मी सुमन लता अभी अपना विद्यार्थी जीवन जी रही हैं। सुमन देश की राजधानी के उस क्षेत्र में पली-बढ़ी हैं जहाँ अभी भी भारत का ग्रामीन परिवेश श्वास लेता है। आप शिक्षण से जुड़ी हैं तथा एक शिक्षिका के रूप में जीवन जीने की योजना बना रही हैं। आपके व्यक्तित्व की सहजता आपकी रचनाओं में स्पष्ट प्रतिबिंबित होती है। व्याकरण और शिल्प के दाँव-पेंच से दूर निपट भावाभिव्यक्ति आपके लेखन को विशेष बनाती है।
संपर्क- 199-बी, इंद्राज़ कॉलोनी, बवाना, नई दिल्ली-110 039
दूरभाष- +91 90154 23921
ई मेल- sumandelhite@gmail.com
सुमन लता की रचनाएँ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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ग़ज़ल
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14 जून सन् 1920 को झुंझुनू (राजस्थान) के छोटे से गाँव टमकोर में श्रीमान् तोलाराम जी की धर्मपत्नी श्रीमती बालूजी ने एक पुत्र को जन्म दिया। नथमल नाम का यह बालक अभी ढाई मास का ही था कि पिता का स्वर्गवास हो गया। दस वर्ष की छोटी सी आयु में इस बालक ने अपनी माता के साथ आचार्य कालूगणी जी से 29 जनवरी 1931 को सरदारशहर में दीक्षा ले ली और बालक नथमल ‘मुनि नथमल’ हो गया। यह पल उस विराट यात्रा का आदि था जो नियति ने एक महापुरुष के लिए निर्धारित की थी। आचार्य कालूगणी ने मुनि तुलसी को आपकी शिक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा। महान गुरु के अध्यापन और आपके मेधावी अध्ययन ने शीघ्र ही आपको प्राकृत, संस्कृत, हिन्दी तथा मारवाड़ी भाषाओं में दक्ष कर दिया। जैन आगम का आपने गहन अध्ययन किया तथा भारतीय एवं पश्चिमी दर्शन के भी आप समीक्षक बन गए। ज्ञान की पिपासा ने आपको भौतिकी, जैव-विज्ञान, आयुर्वेद, राजनीति, अर्थशास्त्र तथा समाजशास्त्र में भी पारंगत कर दिया। काव्य आपके नैसर्गिक गुणों में समाहित था।
2 मार्च सन् 1949 को आचार्य तुलसी ने अणुव्रत आंदोलन शुरू किया, जिसमें आपने महती भूमिका अदा की। जीवन के तीसरे दशक के अंतिम वर्षों में आपने ध्यान की महत्ता को समझते हुए ध्यान की कुछ नई तकनीकें खोजनी शुरू कीं। बीस वर्ष की सतत् साधना के बाद आपने प्रेक्षाध्यान जैसी नितांत वैज्ञानिक तकनीक की खोज की। शिक्षा के क्षेत्र में ‘जीवन विज्ञान’ के नाम से क्रांतिकारी प्रायौगिक अभिक्रम भी आपने प्रस्तुत किया।
12 नवम्बर सन् 1978 को आचार्य तुलसी ने आपको महाप्रज्ञ के नाम से संबोधित किया। 4 फरवरी 1979 को आचार्य तुलसी ने अपने इस अद्वितीय शिष्य को युवाचार्य घोषित किया। 18 फरवरी सन् 1994 को आचार्य तुलसी ने अपना आचार्य पद त्याग दिया और युवाचार्य महाप्रज्ञ को दशम् आचार्य के रूप में प्रतिष्ठापित किया। अणुव्रत, प्रेक्षाध्यान तथा जीवन-विज्ञान अब तक आपकी प्राथमिकता बन चुकी थी।
सन् 1991 में आचार्य तुलसी के सान्निध्य में स्थापित ‘जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय’ ने आपके आध्यात्मिक दर्शन के विकास के नए-नए आयाम स्थापित किए। 5 दिसम्बर सन् 2001 को आचार्य महाप्रज्ञ ने सुजानगढ़ (राजस्थान) से अहिंसा यात्रा आरंभ की जो 14 दिसम्बर सन् 2008 को सुजानगढ़ में ही सम्पन्न हुई। आपने लगभग एक लाख किलोमीटर पदयात्रा का कीर्तिमान स्थापित किया।
9 मई सन् 2010 को राजस्थान के सरदारशहर नामक स्थान पर आप नश्वर देह त्याग कर युवाचार्य महाश्रमण को धर्मसंघ की बाग़डोर सौंप गए।
आचार्य महाप्रज्ञ ने जैन आगम के सम्पादन जैसा महान कार्य तो किया ही, साथ ही साथ जैन दर्शन के फलक को विस्तार देते हुए सभी धर्मावलम्बियों के लिए उसकी प्रासंगिकता भी सिद्ध की।
ध्यान, योग, दर्शन, धर्म, संस्कृति, विज्ञान, स्वास्थ्य, जीवनशैली, व्याकरण, शिक्षा, साहित्य, राजनीति, समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र जैसे तमाम विषयों पर कविता, लघुकथा, निबंध, संस्मरण तथा साक्षात्कार जैसी विधाओं में आपने क़लम चलाई है। आपने जैन तीर्थंकर भगवान ॠषभदेव के जीवन पर आधारित ‘ॠषभायण’ महाकाव्य की रचना की, जिसे विद्वत समाज एक महत्त्वपूर्ण कृति के रूप में देख रहा है।
श्रीमद्भागवद्गीता जैसे कालजयी ग्रंथ को आधार बनाकर आपने ‘गीता संदेश और प्रयोग’ जैसी वैज्ञानिक पुस्तक रची। आप द्वारा रचित ‘संबोधि ग्रंथ’ जैन गीता के रूप में मान्य और प्रतिष्ठित हुआ। ‘महावीर का स्वास्थ्य शास्त्र’, ‘मैं हूँ अपने भाग्य का निर्माता’, ‘लोकतंत्र : नया व्यक्ति नया समाज’ तथा ‘नया मानव नया विश्व’ जैसे अनेक ग्रंथ आपके वैज्ञानिक चिंतन के प्रमाण हो। आपकी आत्मकथा ‘यात्रा एक अकिंचन की’ हाल ही में प्रकाशित हुई है। भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम के साथ आलेखित ग्रंथ ‘सुखी परिवार समृद्ध राष्ट्र’ से भी पाठक लाभान्वित हुए। आपकी प्रवचनमाला ‘महाप्रज्ञ ने कहा’ 39 खण्डों में प्रकाशित हो चुकी है। ‘महावीर का अर्थशास्त्र’ पुस्तक आपके समसामयिक चिंतन का प्रमाण प्रस्तुत करती है।
आपके पचासों ग्रंथों का अंग्रेजी, उड़िया, तमिल, गुजराती, बांग्ला, मराठी, रशियन आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ है।
आपकी कविताओं के भी अनेक संकलन प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें गीत, कविता, क्षणिका तथा अन्य तमाम काव्य विधाओं की रचनाएँ संकलित हैं। आपकी रचनाओं में बिम्बों और कथ्यों का ऐसा अनोखा सामंजस्य है जो किसी भी पाठक को मंत्रमुग्ध करने के लिए पर्याप्त है।
आपकी कविताओं में सूक्तियों का एक विपुल भण्डार दिखाई देता है। आपके रचनाकर्म का बहुत-सा हिस्सा अभी अप्रकाशित है, हम आशा करते हो कि आपका समग्र साहित्य शीघ्रातिशीघ्र प्रकाशन प्रक्रिया से गुज़रकर हमारे ज्ञानक्षेत्र तथा दृष्टिकोण का परिमार्जन करेगा!
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5 जनवरी सन् 1949 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद में जन्मे रमेश चन्द्र शर्मा ‘रमन’ ने सन् 1970 में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की और उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग से वैयक्तिक सहायक के पद से सेवानिवृत्त हुए। संगीत तथा काव्य का अद्भुत संगम आपके रचनाकर्म को विशिष्ट बनाता है। आपके गीतों की धुन गंगा की निर्मल धारा की कलकल के समान है, जिसका अपना कोई विधान न होते हुए भी एक शाश्वत विधान है। गंगा के प्रति लगाव के चलते आप हरिद्वार में ही स्थापित हुए तथा भागीरथी के तट पर सुकून भरा आशियाना बनाकर रहने लगे। बृजक्षेत्र का भाषिक लालित्य आपके गीतों में सहज ही उतर आता है। सन् 1994 में आपके गीतों की ऑडियो कैसेट ‘चाहे जब आ जाना’ का लोकार्पण पद्मश्री गोपालदास नीरज के हाथों से हुआ।
माँ सरस्वती ने आपको स्वर, सुर और शब्द तीनों वरदान दिए हैं।
पता- II/5, प्रोजेक्ट कॉलोनी, मायापुर, हरिद्वार, उत्तराखंड-249401
दूरभाष- +91 9412071755
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2 जून 1982 को कानपुर (उत्तर प्रदेश) में जन्मे आशुतोष द्विवेदी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से गणित विषय में परास्नातक स्तर तक शिक्षाध्ययन करने के बाद भारत सरकार के विदेश मंत्रायलय में कार्यरत हैं। आप सन् 1994 से काव्य साधना में रत हैं। छंद पर आपकी विशेष पकड़ है। पारंपरिक छंदों के प्रयोग में आप पारंगत हैं। इसके अतिरिक्त ग़ज़ल, गीत तथा अन्य विधाओं में भी आपने प्रचुर लेखन किया है। भाषा प्रयोग की शुद्धता आपके काव्य को भीड़ से विलग करती है।
संपर्क - एफ-72, विदेश मंत्रालय आवासीय परिसर, सेक्टर-2, द्वारका, नई दिल्ली
स्थाई पता - 2/16, कमला नगर, कानपुर, उत्तर प्रदेश
ई मेल- ashutoshdwivedi1982@gmail.com
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24 फरवरी 1970 को भिवानी (हरियाणा) में जन्मे श्याम वशिष्ठ ‘शाहिद’ कॉमर्स से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर चुके हैं। वर्तमान में वे पीएच.डी.शोध में संलग्न हैं और बनवारी लाल जिन्दल सूईवाला महाविद्यालय, तोशाम में वाणिज्य विभाग में सहायक प्रवक्ता के रूप में कार्यरत हैं।
सन् 1998 में आपका ग़ज़ल संग्रह ‘मेरे हिस्से का आसमान’ के नाम से प्रकाशित हुआ जिसे पाठकों से ख़ूब सराहना मिली। सन् 2004 में आपके काव्य-कर्म का कुछ अंश ‘मुखौटे’ नामक काव्य-संग्रह में संग्रहीत हुआ। इसके अतिरिक्त आपकी ग़ज़लें, कविताएँ और लघुकथाएँ भी समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से पाठकों तक पहुँचती हैं। इतना ही नहीं आपने ‘चेतना’ और ‘कौन हूँ मैं’ के नाम से दो रेडियो नाटक भी लिखे, जो रोहतक आकाशवाणी से प्रसारित हुए।
आपकी साहित्यिक प्रतिभा के आधार पर लॉयन्स क्लब, भिवानी ने आपको ‘साधना सम्मान’ से सम्मानित किया। नटराज कलामंच ने आपको ‘साहित्य सेवी’ की उपाधि से विभूषित किया। इसके अतिरिक्त विविध साहित्यिक-सामाजिक संस्थाओं ने रंगमंच तथा साहित्य सृजन के लिए आपको सम्मानित किया है।
रंगमंच तथा संगीत आपके भीतर के कलाकार के महत्तवपूर्ण आयाम हैं। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के युवा महोत्सवों तथा राष्ट्रीय युवा महोत्सव (1992) में आप सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के रूप में चिन्हित किए जा चुके हैं। तमाम कवि-सम्मेलनों तथा मुशायरों में आप निरंतर शिरक़त करते हैं। मेघदूत थिएटर ग्रुप (भिवानी) से आप सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। इसके अतिरिक्त दो वर्ष तक आपने दूरदर्शन पर समाचार वाचन भी किया है। सन् 1991 से आप आकाशवाणी के नाटक, साहित्य, संगीत कार्यक्रमों में अनुबंधित कलाकार हैं।
दूरभाष- +91 9869716671
ई मेल- shyamvashishtha@gmail.com
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