कवि-परिचय

श्रवण राही

shravan

6 जनवरी 1945 को उत्तर प्रदेश के एटा ज़िले के ग्राम सोरा में जन्मे श्रवण राही गीत की उस संवेदना के रचनाकार थे जो कहीं गहरे तक उतर कर हृदय की कोमलतम शिराओं को हल्के से स्पर्श कर पूरे शरीर में एक सिहरन पैदा कर जाती है। स्नातकोत्तर तक शिक्षा प्राप्त कर आपने भारतीय सेना के माध्यम से देश की सेवा की। सादगी यदि मानव का रूप धर ले तो उसकी तस्वीर श्रवण राही जैसी होगी। बेहद आम होते हुए भी बेहद ख़ास शब्दावली में अपने विशेष तुकान्तों के साथ श्रवण राही के गीत सुनने वाले के चेहरे पर आश्चर्य और आह्लाद का एक मिश्रित भाव उत्पन्न करते थे।
आपने हिन्दीतर भारतीय भाषाओं की कविताओं का अनुवाद भी किया और विविध समाचार पत्रों में कला संपादक के रूप में भी कार्य किया। आपके मुक्तकों में सूक्तियों का समावेश भी होता था और मन के सहज भावों की सक्षम अभिव्यक्ति भी।
श्रवण राही की रचनाओं की भाषा क्लिष्टता और सहजता की उस विभाजन रेखा पर खड़ी दिखाई देती है जहाँ बुध्दिजीवियों से लेकर आम आदमी तक के लिए वे रचनाएँ पसंदीदा बन पड़ती हैं।
मंचीय कवि होते हुए भी आपके व्यक्तित्व में संतोष का गुण इतने गहरे तक समाविष्ट था कि न तो आपने कभी किसी कवि-सम्मेलन में जाने के लिए बेचैनी दिखाई और न ही किसी कवि-सम्मेलन का न्यौता आने पर अतीव हर्ष की अभिव्यक्ति की। कुल मिलाकर आपका व्यक्तित्व एक संतुष्ट व्यक्तित्व था जो पीड़ा को भोगता भी था तो ‘…तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ के सूत्र को अपनाते हुए। यही विलग पीड़ा आपकी रचनाओं में झलकती है।
राजमार्गों से लेकर मेहंदी लगी हथेलियों तक के गीत आपके रचना कर्म में सम्मिलित हुए। अनार के फूल जैसे अनोखे बिम्ब उठाकर आपने यह सिध्द किया कि आपके बिम्ब परम्परागत प्रतीकों के मोहताज नहीं हैं। भारत माता के स्वाभिमान के गीतों से लेकर मुफ़लिसी, बदनसीबी, जोश, उत्साह और संबंधों की संवेदना तक के गीत आपकी लेखनी से लिखे गए।
काव्य की इसी समर्पित सेवा के दौरान दिनाँक 22 मार्च 2008 को होली के एक कवि-सम्मेलन में कविता पढ़ने के लगभग 300-400 सेकेंड बाद आपने अंतिम साँस ली। आपके दो कविता संग्रह ‘आस्थाओं के पथ’ और ‘पीर की बाँसुरी’ प्रकाशित हुए। आपके आकस्मिक निधन पर एक श्रध्दांजलि ग्रंथ भी प्रकाशित हुआ। आपके नाम से श्रवण राही स्मृति न्यास की स्थापना की गई है जो काव्य के विकास के लिए निरंतर प्रयासरत है।

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