कवि-परिचय

शक़ील बिजनौरी

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16 सितम्बर 1944 को बिजनौर में जन्मे शक़ील अहमद ख़ान उर्फ़ ‘शक़ील बिजनौरी’ के पिता का नाम मोहम्मद यामीन ख़ान उर्फ़ ‘शौक़ बिजनौरी’ था। शक़ील बिजनौरी की शाइरी में बिजनौर की ख़ुश्बू रची-बसी है। मेरठ विश्वविद्यालय से ड्राईंग एंड पेंटिंग में स्नातकोत्तर की शिक्षा पूर्ण करने के साथ साथ आपने लखनऊ विश्वविद्यालय से उर्दू में भी स्नातकोत्तर अध्ययन किया। आप शाइरी के साथ यात्राएँ, फोटोग्राफी तथा शूटिंग (पिस्टल, राइफल 22) का भी शौक़ फरमाते हैं।
‘दश्ते-इम्कां’ के नाम से आपका उर्दू शाइरी का एक संग्रह सन् 1988 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद आपकी शोधप्रिय प्रवृत्ति ने आपसे बिजनौर का राजनीतिक-सामाजिक इतिहास लिखवाया, जो ‘बिजनौर दर्पण’ के नाम से छपने को तैयार है। शाइरी में भी शोध कर के आपने दो खण्डों में ‘तारीख़-ए-अदब ज़िला बिजनौर’ के नाम से तीन सौ वर्षों पर आधारित तज़करा-ए-शोरा-ए-ज़िला बिजनौर लिखा है। यह अद्भुत शोध भी शीघ्र पाठकों को पढ़ने को मिलेगा। ‘जलती रुतों की गोद में’ शीर्षक से आपका हिन्दी ग़ज़ल का एक संग्रह भी प्रेस में है।
मुशाइरों तथा कवि-सम्मेलनों में अपने क़लाम से श्रोताओं को झुमाने वाले इस शाइर के खाते में दर्जनों सम्मान तथा पुरस्कार शामिल हैं। तमाम संस्थाओं में आप विविध महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए साहित्य तथा समाज की सेवा करते रहे हैं।
उत्तार प्रदेश के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग में ए सी पी के पद से सेवानिवृत होने के बाद अब आप पूर्णतया साहित्य साधना तथा शोध में संलग्न हैं। आपकी शाइरी की लज़ीज़ियत तथा आपके अशआर का विस्तृत कॅनवास अदीबों के ज़ेह्न में सीधे उतर कर एक पुरसुक़ून अहसास दिलाता है।

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