कवि-परिचय

जगदम्बाप्रसाद मिश्र ‘हितैषी’

गंजमुरादाबाद जनपद उन्नाव के मूलनिवासी जगदम्बाप्रसाद ‘हितैषी’ जी बहुत छोटी आयु से ही स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने लगे थे। मातृवेदी क्रांतिकारी संस्था के सक्रिय सदस्य के रूप में प्रारंभ हुई उनकी यात्रा अनेक बार कारावास के दंड झेलती हुई जन-जन के हृदय तक पहुँची। आपकी रचनाएँ आज़ादी के आंदोलन में देशवासियों की प्रेरणा का मंत्र बनी। आपके काव्यगुरु सुकवि गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ थे।
आपकी प्रारंभिक शिक्षा ग्राम्य पाठशाला में ही हुई। आप संस्कृत, फ़ारसी, उर्दू, हिन्दी तथा अंग्रेजी आदि अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। लोक-बोलियों को भी आपने अपने रचनाकर्म का माध्यम बनाया। ‘मातृगीता’, ‘नवोदिता’, ‘कल्लोलिनी’ तथा ‘वैशाली’ नामक काव्य-संग्रहों में आपकी रचनाएँ संकलित हैं। 14 मार्च 1957 को आपका निधन स्वतंत्र भारत में हुआ। हितैषी जन्मभूमि गंजमुरादाबाद व क्षेत्रीय नागरिकों एवं कवियों ने हितैषी स्मारक सेवा समिति का गठन कर रखा हे।
राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन ने आपके विषय में कहा है- ”हितैषी जी ने सदा कंधे से कंधा मिलाकर हिन्दी का कार्य किया है। उन्होंने साहित्यिक व्यापार नहीं किया, अपने जीवन का बहुत बड़ा भाग अर्थाभाव में बिताया और नए साहित्यकारों को प्रोत्साहित किया।”
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में हितैषी जी का परिचय देते हुए लिखा है- “खड़ी बोली के कवित्तों और सवैयों में ये वही सरसता, वही लचक, वही भावभंगी लाए हैं जो ब्रजभाषा के कवित्तों और सवैयों में पाई जाती है। इस बात में इनका स्थान निराला है। यदि खड़ी बोली की कविता आरंभ में ऐसी ही सजीवता के साथ चली होती जैसी इनकी रचनाओं में पाई जाती है तो उसे रूखी और नीरस कोई न कहता। रचनाओं का रंगरूप अनूठा और आकर्षक होने पर भी अजनबी नहीं है। शैली वही पुराने उस्तादों के कवित्त सवैयों की है जिनमें वाग्धारा अंतिम चरण पर जाकर चमक उठती है। हितैषी जी ने अनेक काव्योपयुक्त विषय लेकर फुटकल छोटी-छोटी रचनाएँ की हैं। अन्योक्तियाँ इनकी बहुत मार्मिक हैं।’

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