नील

नील

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5 फरवरी सन् 1985 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले में जन्मे नील बचपन की संवेदनाओं के ऐसे सशक्त रचनाकार हैं, जिन्हें पढ़ना-सुनना मन को कहीं अतीत की स्मृतियों में ला पटकता है। नील अभी स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरांत उच्च शिक्षा में संलग्न हैं। बालकों के व्यक्तित्व के विकासार्थ भी नील एक अध्यापक के रूप में कार्य कर रहे हैं। नील बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। वे अभिनय भी करते हैं और थियेटर के लिए लिखते भी हैं। उनकी अभिरुचियों में यात्राएँ भी हैं और छायांकन भी। वे गाँव-गाँव, गली-गली भी घूमना चाहते हैं और देश-देश, शहर-शहर भी। कुल मिलाकर ‘झोला उठाकर चले’ वाली संस्कृति का यह रचनाकार जितना भ्रमणशील है उतना ही उसके व्यक्तित्व में स्थायित्व भी है।
मंच पर प्रस्तुति के समय नील शब्दों को इतना चबा-चबा कर बोलते हैं, मानो एक-एक शब्द के उच्चारण काल में एक-एक घटना जी रहे हों। नील की रचनाएँ बचपन के उस हिंडोले जैसी हैं जिनकी सुखद स्मृतियों में पूरा जीवन जिया जा सकता है। नील का अवलोकन बेहद सूक्षम है। इसके साथ ही उनकी कल्पनाओं का कॅनवास भी स्वयं में अनोखा और विराट है। कभी-कभी तो उनके बिम्बों तथा प्रतीकों को सुनकर यह नहीं समझ आता कि इन बिम्बों को लिखने के लिए काग़ज़ कहाँ से आता है।
उल्लास से सदैव आपूरित रहने वाले नील अपनी कल्पनाओं में क्षितिज को तुरपने से लेकर तितलियों की निश्छलता तक तमाम बिम्बों के माध्यम से सामाजिक विडम्बनाओं तथा भरभराकर टूटती संवेदनाओं की ओर इंगित करते हैं।

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