कवि-परिचय

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

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15 अप्रैल सन् 1865 को आज़मगढ़ के निज़ामाबाद क़स्बे में जन्मे अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध के पिता का नाम भोलासिंह और माता का नाम रुक्मणि देवी था। अस्वस्थता के कारण हरिऔध जी का विद्यालय में पठन-पाठन न हो सका अतः इन्होने घर पर ही उर्दू,संस्कृत ,फारसी,बंगला एवं अंग्रेजी का अध्ययन किया। 1883 में ये निजामाबाद के मिडिल स्कूल के हेडमास्टर हो गए। 1890 में कानूनगो की परीक्षा पास करने के बाद आप कानूनगो बन गए। सन 1923 में पद से अवकाश लेने पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बने । 16 मार्च ,सन 1947 को इनका निधन हो गया। खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्यकार हरिऔध जी का सृजनकाल हिन्दी के तीन युगों में विस्तृत है भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग और छायावादी युग। इसीलिये हिन्दी कविता के विकास में ‘हरिऔध’ जी की भूमिका नींव के पत्थर के समान है। उन्होंने संस्कृत छंदों का हिन्दी में सफल प्रयोग किया है। ‘प्रियप्रवास’ की रचना संस्कृत वर्णवृत्त में करके जहां उन्होंने खड़ी बोली को पहला महाकाव्य दिया, वहीं आम हिन्दुस्तानी बोलचाल में ‘चोखे चौपदे’ , तथा ‘चुभते चौपदे’ रचकर उर्दू जुबान की मुहावरेदारी की शक्ति भी रेखांकित की। प्रियप्रवास और वैदेही वनवास आपके महाकाव्य हैं। चोखे चौपदे, चुभते चौपदे, कल्पलता, बोलचाल, पारिजात और हरिऔध सतसई मुक्तक काव्य की श्रेणी में आते हैं। ठेठ हिंदी का ठाठ और अधखिला फूल नाम से आपने उपन्यास भी लिखे। इसके अतिरिक्त नाटक और आलोचना में भी आपने उल्लेखनीय योगदान दिया है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में हरिऔध जी का परिचय देते हुए लिखा है- “यद्यपि उपाध्याय जी इस समय खड़ी बोली के और आधुनिक विषयों के ही कवि प्रसिध्द हैं, पर प्रारंभकाल में ये भी पुराने ढंग की शृंगारी कविता बहुत सुंदर और सरस करते थे। इनके निवास स्थान निज़ामाबाद में सिख संप्रदाय के महंत बाबा सुमेरसिंह जी हिन्दी काव्य के बड़े प्रेमी थे। उनके यहाँ प्राय: कवि समाज एकत्र हुआ करता था, जिसमें उपाध्याय जी भी अपनी पूर्तियाँ पढ़ा करते थे। इनका हरिऔध उपनाम उसी समय का है। इनकी पुराने ढंग की कविताएँ ‘रसकलस’ में संगृहीत हैं जिसमें इन्होंने नायिकाओं के कुछ नए ढंग के भेद रखने का प्रयत्न किया है। ये भेद रस सिध्दांत के अनुसार ठीक नहीं उतरते।”

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6 Responses to “अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’”

  1. 1
    srinivasan m Says:

    i am really happy to see this site. but i have one request wld pl publish the literally works of hariaudh and the critisicm and evaluation on his works. pl do make it available in this site at the earliest as it wld be helpful for the new readers of this language and for the young generation.

  2. 2
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  3. 3
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  5. 5
    patrick Says:

    in 1916 he wrote a complete book on kabir wonder if anyone is aware of it and could give me an information on how to be able to read it

  6. 6
    rkpetwal Says:

    Hariodh g ki kavitain man or aatma ko choo zati hai

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