PRAVEEN SHUKLA प्रवीण शुक्ल

PRAVEEN SHUKLA प्रवीण शुक्ल

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7 जून 1970 को पिलखुवा (ग़ाज़ियाबाद) में जन्मे प्रवीण शुक्ल अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर तथा बी.एड. उपाधियाँ प्राप्त कर चुके हैं और पीएच.डी. शोध में संलग्न हैं तथा दिल्ली के एक विद्यालय में अर्थशास्त्र के व्याख्याता के रूप में सेवारत हैं। आपके पिता श्री ब्रज शुक्ल ‘घायल’ भी अपने काव्यकर्म के लिए जाने जाते हैं।
आप वर्तमान समय में हिंदी की वाचिक परंपरा के कवियों में अग्रिम पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं। हास्य, व्यंग्य, गीत, ग़ज़ल और अन्य तमाम विधाएँ आपके सृजन के दायरे में आती हैं। तमाम जनसंचार माध्यमों से आपकी रचनाएँ, शोधपत्र तथा साक्षात्कार प्रसारित-प्रकाशित हो चुके हैं। आपकी साहित्य-सेवा के लिए आपको विविध संस्थाओं ने लगभग दर्जन भर पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा है। इनमें वर्ष 1998 का हिंदी गौरव सम्मान, बर्ष 2004 का अट्टहास युवा रचनाकार सम्मान और वर्ष 2006 का ओमप्रकाश आदित्य सम्मान शामिल है। वर्ष 2010 के काका हाथरसी पुरस्कार की घोषणा आपके लिए की गई है। अब तक आपके चार काव्य संकलन ‘स्वर अहसासों के’; ‘कहाँ ये कहाँ वो’; ‘हँसते-हँसाते रहो’ और ‘तुम्हारी आँख के आँसू’ प्रकाशित हो चुके हैं। आपकी पुस्तक ‘गांधी और गांधीगिरी’ का गुजराती, अंग्रेजी तथा मराठी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। ‘सफ़र बादलों का’ शीर्षक से आपका यात्रा वृत्तांत भी पाठकों के लिए उपलब्ध है। आपने अनेक महत्वपूर्ण कृतियों का संपादन भी किया है जिनमें अल्हड़ बीकानेरी जी की रचनाओं का संकलन ‘हर हाल में ख़ुश हैं’ तथा संतोष आनंद जी के संकलन ‘इक प्यार का नग़मा है’ तथा ‘मुहब्बत है क्या चीज़!’ सम्मिलित हैं।
आपका ग़ज़ल संग्रह ‘आइना अच्छा लगा’ और व्यंग्य लेख संकलन ‘नेताजी का चुनावी दौरा’ शीघ्र प्रकाशित होने जा रहे हैं। आप विविध समाचार-पत्र तथ पत्रिकाओं में नियमित स्तंभ लिखते रहे हैं। आपने बैंकाक, मस्कट, दुबई, भूटान और यूनाइटेड किंग्डम जैसे देशों में अपनी काव्य-पताका फहराई है।
आपकी काव्य प्रतिभा के आधार पर आपके विषय में पद्मश्री गोपालदास ‘नीरज’ ने ‘तुम्हारी आँख के आँसू’ की भूमिका में लिखा है कि- “प्रवीण शुक्ल ने अपनी काव्य-प्रतिभा का जो स्वरूप प्रस्तुत किया है, उसे देखने के बाद मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूँ कि उनके पास नया सोच, नया कथ्य, नया बिम्ब सभी कुछ अनूठा है। यह युवा कवि आगे चलकर साहित्य-जगत को कोई ऐसी कृति अवश्य देगा जिससे वह स्वयं तो बड़ा कवि माना ही जायेगा, साथ ही उसकी इस कृति से साहित्य-जगत भी गौरवान्वित होगा।”

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