कवि-परिचय

भवानी प्रसाद मिश्र

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29 मार्च सन् 1913 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले में जन्मे भवानी प्रसाद मिश्र दूसरे सप्तक के प्रमुख कवि हैं। आपने हिन्दी, अंग्रेजी तथा संस्कृत विषयों से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। महात्मा गांधी जी के दर्शन से प्रभावित यह रचनाकार हिन्दी काव्य जगत् में गीत का अलबेला हस्ताक्षर था। भवानी दादा ने सृजन की भावुकता और जीवन की व्यवहारिकता के बीच की पसो-पेश को इस बेबाक़ी से अभिव्यक्त किया कि श्रोता और पाठक दाँतों तले उंगलियाँ दबा लेते थे।
गांधीवाद की ईमानदारी भवानी दादा के व्यक्तित्व का विशेष अंग थी। इसी ईमानदारी की साफ़-साफ़ अभिव्यक्ति आपके पहले संग्रह ‘गीत-फ़रोश’ में हुई है। प्रभावपूर्ण शैली, निष्कपट बेबाक़ी, सत्योद्धाटन की अदम्य क्षमता तथा काव्य की मर्यादा का अनुपालन इस संग्रह की रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देता है।
भवानी दादा की रचनाओं में पाठक से संवाद करने की क्षमता है। सन् 1972 में आपकी कृति ‘बुनी हुई रस्सी’ के लिए आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक पुरस्कारों के साथ-साथ आपने भारत सरकार का पद्म श्री अलंकार भी प्राप्त किया।
‘गीत-फ़रोश’, ‘चकित है दुख’, ‘गांधी पंचशती’, ‘अंधेरी कविताएँ ‘, ‘बुनी हुई रस्सी’, ‘व्यक्तिगत’, ‘ख़ुश्बू के शिलालेख’, ‘परिवर्तन जिए ‘, ‘त्रिकाल संध्या’, ‘अनाम तुम आते हो’, ‘इंदन मम्’, ‘शरीर, कविता, फसलें और फूल’, ‘मानसरोवर’, ‘दिन’, ‘संप्रति’ और ‘नीली रेखा तक’ आदि कुल 22 पुस्तकें आपकी प्रकाशित हुईं। आपने संस्मरण, निबंध तथा बाल-साहित्य भी रचा।
20 फरवरी सन् 1985 को हिन्दी काव्य-जगत् का यह अनमोल सितारा अपनी कविताओं की थाती यहाँ छोड़ हमेशा के लिए हमसे बिछड़ गया।

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