कवि-परिचय

RAMESH RAMAN रमेश ‘रमन’

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5 जनवरी सन् 1949 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद में जन्मे रमेश चन्द्र शर्मा ‘रमन’ ने सन् 1970 में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की और उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग से वैयक्तिक सहायक के पद से सेवानिवृत्त हुए। संगीत तथा काव्य का अद्भुत संगम आपके रचनाकर्म को विशिष्ट बनाता है। आपके गीतों की धुन गंगा की निर्मल धारा की कलकल के समान है, जिसका अपना कोई विधान न होते हुए भी एक शाश्वत विधान है। गंगा के प्रति लगाव के चलते आप हरिद्वार में ही स्थापित हुए तथा भागीरथी के तट पर सुकून भरा आशियाना बनाकर रहने लगे। बृजक्षेत्र का भाषिक लालित्य आपके गीतों में सहज ही उतर आता है। सन् 1994 में आपके गीतों की ऑडियो कैसेट ‘चाहे जब आ जाना’ का लोकार्पण पद्मश्री गोपालदास नीरज के हाथों से हुआ।
माँ सरस्वती ने आपको स्वर, सुर और शब्द तीनों वरदान दिए हैं।

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हरिवंश राय बच्चन

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27 नवंबर 1907 को इलाहाबाद में जन्मे हरिवंश राय बच्चन ने प्रयाग विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद विश्वविद्यालय से पीएच.डी. किया। आपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन किया और बाद में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ रहे। राज्यसभा के मनोनीत सदस्य के रूप में भी आपने दायित्व निर्वाह किया।
हालावाद के एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ के रूप में बच्चन जी सदैव याद किये जाएंगे। मधुशाला जैसी अमर कृति के इस रचयिता को अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए।
गीतों के इस सौदागर के गीतों में दर्शन, प्रेम और आध्यात्म सहज ही झलक उठते हैं। ‘निशा-निमंत्रण’, ‘प्रणय पत्रिका’, ‘मधुकलश’, ‘एकांत संगीत’, ‘सतरंगिनी’, ‘मिलन यामिनी’, ”बुद्ध और नाचघर’, ‘त्रिभंगिमा’, ‘आरती और अंगारे’, ‘जाल समेटा’, ‘आकुल अंतर’ तथा ‘सूत की माला’ नामक संग्रहों में आपकी रचनाएँ संकलित हैं। आपकी कृति ‘दो चट्टाने’ को 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मनित किया गया। इसी वर्ष उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा एफ्रो-एशियाई सम्मेलन के कमल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
आपकी आत्मकथा चार भागों में प्रकाशित हुई है। बिड़ला फाउन्डेशन ने इस आत्मकथा के लिये आपको सरस्वती सम्मान दिया।
सहजता और संवेदनशीलता उनकी कविता का एक विशेष गुण है। यह सहजता और सरल संवेदना कवि की अनुभूति मूलक सत्यता के कारण उपलब्ध हो सकी। बच्चन जी ने बडे साहस, धैर्य और सच्चाई के साथ सीधी-सादी भाषा और शैली में सहज कल्पनाशीलता और जीवन्त बिम्बों से सजाकर सँवारकर अनूठे गीत हिन्दी को दिए।
18 जनवरी सन् 2003 को मुम्बई में आपका निधन हो गया।

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सोहनलाल द्विवेदी

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22 फरवरी सन् 1906 को कानपुर के पास बिंदकी नामक स्थान पर जन्मे सोहनलाल द्विवेदी हिंदी काव्य-जगत् की अमूल्य निधि हैं। ऊर्जा और चेतना से भरपूर रचनाओं के इस रचयिता को राष्ट्रकवि की उपाधि से अलंकृत किया गया। द्विवेदी जी पर लिखे गए एक लेख में अच्युतानंद मिश्र जी ने लिखा है- “मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, रामधारी सिंह दिनकर, रामवृक्ष बेनीपुरी या सोहनलाल द्विवेदी राष्ट्रीय नवजागरण के उत्प्रेरक ऐसे कवियों के नाम हैं, जिन्होंने अपने संकल्प और चिन्तन, त्याग और बलिदान के सहारे राष्ट्रीयता की अलख जगाकर, अपने पूरे युग को आन्दोलित किया था, गाँधी जी के पीछे देश की तरूणाई को खडा कर दिया था। सोहनलालजी उस श्रृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी थे। डा. हरिवंशराय ‘बच्चन’ ने एक बार लिखा था ‘ जहाँ तक मेरी स्मृति है, जिस कवि को राष्ट्रकवि के नाम से सर्वप्रथम अभिहित किया गया, वे सोहनलाल द्विवेदी थे। गाँधीजी पर केन्द्रित उनका गीत युगावतार या उनकी चर्चित कृति ‘ भैरवी ‘ की पंक्ति वन्दना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो, हो जहाँ बलि शीश अगणित एक सिर मेरा मिला लो ‘ में कैद स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का सबसे अधिक प्रेरणा गीत था।”
महात्मा गांधी के दर्शन से प्रभावित, द्विवेदी जी ने बालोपयोगी रचनाएँ भी लिखीं। अच्युतानंद जी ने डांडी यात्रा का ज़िक़्र करते हुए लिखा है- “गाँधी जी ने 12 मार्च 1930को अपने 76 सत्याग्रही कार्य कर्त्ताओं के साथ साबरमती आश्रम से 200 मील दूर दांडी मार्च किया था। भारत में पद यात्रा, जनसंपर्क और जनजागरण की ऋषि परम्परा मानी जाती है। उस यात्रा पर अंग्रेजी सत्ता को ललकारते हुए सोहनलाल जी ने कहा था -”या तो भारत होगा स्वतंत्र, कुछ दिवस रात के प्रहरों पर या शव बनकर लहरेगा शरीर, मेरा समुद्र की लहरों पर, हे शहीद, उठने दे अपना फूलों भरा जनाजा। आज दांडी मार्च के उत्सव में सोहनलालजी का जिक्र कहीं है?”
हजारी प्रसाद द्विवेदी, जो कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय में सोहनलाल जी के सहपाठी थे, उन्होंने सोहनलाल द्विवेदी जी पर एक लेख लिखा था- “विश्वविद्यालय के विद्यार्थी समाज में उनकी कविताओं का बडा गहरा प्रभाव पडता था। उन्हें गुरूकुल महामना मदनमोहन मालवीय का आशीर्वाद प्राप्त था। अपने साथ स्वतंत्रता संग्राम में जूझने के लिए नवयुवकों की टोली बनाने में वे सदा सफल रहे भाई सोहनलालजी ने ठोंकपीट कर मुझे भी कवि बनाने की कोशिश की थी, छात्र कवियों की संस्था ‘ सुकवि समाज ‘के वे मंत्री थे और मै संयुक्त मंत्री, बहुत जल्दी ही मुझे मालूम हो गया कि यह क्षेत्र मेरा नहीं है, फिर भी उनके प्रेरणादायक पत्र मिलते रहते थे। यह बात शायद वे भी नहीं जानते थे कि हिन्दी साहित्य की भूमिका ‘मैने उन्हीं के उत्साहप्रद पत्रों के कारण लिखी थी।”
सन् 1941 में देश प्रेम से लबरेज भैरवी, उनकी प्रथम प्रकाशित रचना थी। उनकी महत्वपूर्ण शैली में पूजागीत, युगाधार, विषपान, वासन्ती, चित्रा जैसी अनेक काव्यकृतियाँ सामने आई थी। उनकी बहुमुखी प्रतिभा तो उसी समय सामने आई थी जब 1937 में लखनऊ से उन्होंने दैनिक पत्र अधिकार का सम्पादन शूरू किया था। चार वर्ष बाद उन्होंने अवैतनिक सम्पादक के रूप में “बालसखा” का सम्पादन भी किया था देश में बाल साहित्य के वे महान आचार्य थे।
1 मार्च 1988 को राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी चिर निद्रा में लीन हो गए।
आपके द्वारा लिखीं गई शिशुभारती, बच्चों के बापू, बिगुल, बाँसुरी और झरना, दूध बतासा जैसी दर्जनों रचनाएँ बच्चों को आकर्षित करती हैं। 1969 में भारत सरकार ने आपको पद्दश्री उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया था।

स्रोत- सृजनगाथा में लिखा गया अच्युतानंद जी का लेख

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सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

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15 सितम्बर सन् 1927 को उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले में जन्मे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना तीसरे सप्तक के महत्वपूर्ण कवियों में से एक हैं। वाराणसी तथा प्रयाग विश्वविद्यालय से शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत आपने अध्यापन तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य किया। आप आकाशवाणी में सहायक निर्माता; दिनमान के उपसंपादक तथा पराग के संपादक रहे। यद्यपि आपका साहित्यिक जीवन काव्य से प्रारंभ हुआ तथापि ‘चरचे और चरखे’ स्तम्भ में दिनमान में छपे आपके लेख ख़ासे लोकप्रिय रहे। सन् 1983 में आपको अपने कविता संग्रह ‘खूँटियों पर टंगे लोग’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। आपकी रचनाओं का अनेक भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। कविता के अतिरिक्त आपने कहानी, नाटक और बाल साहित्य भी रचा। 24 सितम्बर 1983 को हिन्दी का यह लाडला सपूत आकस्मिक मृत्यु को प्राप्त हुआ।
‘काठ की घाटियाँ’, ‘बाँस का पुल’, ‘एक सूनी नाव’, ‘गर्म हवाएँ’, ‘कुआनो नदी’, ‘कविताएँ-1′, ‘कविताएँ-2′, ‘जंगल का दर्द’ और ‘खूँटियों पर टंगे लोग’ आपके काव्य संग्रह हैं।
‘उड़े हुए रंग’ आपका उपन्यास है। ‘सोया हुआ जल’ और ‘पागल कुत्तों का मसीहा’ नाम से अपने दो लघु उपन्यास लिखे। ‘अंधेरे पर अंधेरा’ संग्रह में आपकी कहानियाँ संकलित हैं। ‘बकरी’ नामक आपका नाटक भी खासा लोकप्रिय रहा। बालोपयोगी साहित्य में आपकी कृतियाँ ‘भौं-भौं-खों-खों’, ‘लाख की नाक’, ‘बतूता का जूता’ और ‘महंगू की टाई’ महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। ‘कुछ रंग कुछ गंध’ शीर्षक से आपका यात्रा-वृत्तांत भी प्रकाशित हुआ। इसके साथ-साथ आपने ‘शमशेर’ और ‘नेपाली कविताएँ’ नामक कृतियों का संपादन भी किया।

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नरेश शांडिल्य

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15 अगस्त 1958 को दिल्ली में जन्मे नरेश शांडिल्य इस समय एक सशक्त दोहाकार के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं। हिन्दी विषय से स्नातकोत्तार तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद बैंककर्मी के रूप में आपने आजीविका प्रारंभ की।
ख़ुद्दारी, संस्कृति और आत्मविश्वास से ओत-प्रोत आपकी रचनाएँ अपने चरम पर पहुँचते हुए दार्शनिक होती जाती हैं। ग़ज़ल, गीत, मुक्तछंद तथा दोहे आदि तमाम विधाओं में आपने अपनी लेखनी चलाई है। वर्तमान हिन्दी काव्य मंच पर तमाम संचालक आपके दोहों का प्रयोग करते देखे जा सकते हैं।
इस समय आप त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘अक्षरम् संगोष्ठी’ के संपादक हैं तथा प्रवासी भारतीयों की अंतरराष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका ‘प्रवासी टुडे’ के रचनात्मक निदेशक हैं।
देश-विदेश में आपने अपनी कविताओं के माध्यम से श्रोताओं से सीधे तारतम्य स्थापित किया है। अनेक महत्तवपूर्ण सम्मान तथा पुरस्कार आपको प्राप्त हैं और साथ ही ‘टुकड़ा-टुकड़ा ये ज़िन्दगी’, ‘दर्द जब हँसता है’, ‘मैं सदियों की प्यास’ तथा ‘कुछ पानी कुछ आग’ के नाम से आपके काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इतना ही नहीं ‘नाटय प्रस्तुति में गीतों की सार्थकता’ विषय पर आपका एक शोधकार्य भी उपलब्ध है।
आप नाटय जगत् से भी जुड़े हैं। अनेक नाटय प्रस्तुतियों में आपने स्वयं अभिनय तो किया ही है साथ ही लगभग 20 नाटकों के लिए आपने 50 से अधिक गीत भी लिखे हैं।
आपकी पुस्तक ‘कुछ पानी कुछ आग’ की भूमिका में डॉ. बलदेव वंशी आपके विषय में लिखते हैं- ”कवि के स्वर में एक चुनौती भी है। निर्धन, उपेक्षित, उत्पीड़ित की पक्षधरता में वह दृढ़ता से सन्नध्द ही नहीं, ललकारता भी है- अपनी मानवीय संवेदना की ज़मीन पर खड़ा होकर- अलमस्त फ़क़ीर और कबीर के स्वरों में। जुझारूपन, संघर्ष और चुनौती को मशाल की तरह उठाए कवि कबीरी-फ़क़ीरी दु:साहस में से बोलता है, जो अपने समय की अपने से बड़ी राजसी-साम्प्रदायिक, सामाजिक सत्ता-व्यवस्थाओं से भिड़ने से ज़रा भी संकोच नहीं करता।”
उनकी ग़ज़लों की प्रशंसा करते हुए वरिष्ठ कवि बालस्वरूप राही लिखते हैं- ”दोहा, गीत तथा नुक्कड़ कविता में पारंगत होने के कारण नरेश शांडिल्य को अपनी ग़ज़लों में इन विधाओं की विशेषताओं का पूरा-पूरा लाभ मिला है। वे हमें कहीं भी बनावटी अथवा ऊपरी नहीं लगतीं। उनकी ग़ज़लों में गीतों जैसी एकान्विति है। यह नहीं कि एक शे’र गहरी पीड़ा का है तो दूसरा विलास-क्रीड़ा का। दोहों के अत्यंत सफल कवि होने के कारण उन्हें दोहों की सार्थक संक्षिप्तता का लाभ अपने शे’रों की बुनावट में मिला है।”

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राजेश जैन ‘चेतन’

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8 अगस्त 1966 को हरियाणा के भिवानी ज़िले में जन्मे राजेश जैन ‘चेतन’ वर्तमान में मंच पर सर्वाधिक सक्रिय कवियों में से एक हैं। वाणिज्य विषय से स्नातकोत्तर तक शिक्षा ग्रहण करते हुए भी कविता और साहित्य आपकी अभिरुचियों में सदैव सम्मिलित रहा है। दिल्ली के लालक़िले से लेकर ब्रिटेन, अमरीका और तमाम मुल्क़ों में अपनी कविता के माध्यम से भारतीय संस्कृति और भारतीयता की अलख जगाने वाले राजेश चेतन की रचनाओं का प्रमुख आधार भारतीयता का वह भाव है जिसमें इस देश की महती परंपराओं के साथ-साथ शक्ति बोध और सौंदर्य बोध घुलता है। दर्जनों पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित यह रचनाकार पहली बार सन् 1989 में हरियाणा के हाँसी नामक स्थान पर प्रकाश में आया। आत्मविश्वास और ऊर्जा से भरा आपका मंच संचालन किसी भी कवि सम्मेलन को जीवंत कर देता है। इस समय आप नई पीढ़ी के रचनाकारों को मंच से जोड़ने के लिये निरंतर प्रयासरत हैं। आपके के दो काव्य संग्रह, 2 काव्य संकलन, 2 ऑडियो सीडी और एक वीडियो सीडी उपलब्ध हैं। आपके नाम से प्रतिवर्ष एक काव्य सम्मान भी प्रदान किया जाता है।

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अरुण मित्तल ‘अद्भुत’

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21 फ़रवरी 1985 को जन्मे युवा कवि अरुण मित्तल ‘अद्भुत’ ओज के युवा हस्ताक्षर हैं. प्रबंधन के प्राध्यापक होने के बाद भी अरुण अद्भुत को हिंदी कविता के अनेक विधाओं के व्याकरण एवं संवेदना की गहरी समझ है. वे गजल, कविता, कहानी, लघुकथा, संस्मरण, लेख तथा फीचर, इत्यादि अनेक विधाओं में अपनी लेखनी चला रहे हैं, अरुण अद्भुत का मुख्य स्वर “ओज” है. उनकी लगभग 300 रचनाएँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. एवं लगभग 50 कविताएँ, गजलें एवं लेख, हिन्दयुग्म, अनुभूति, नई कलम, काव्यांचल, रचनाकार, सृजनगाथा, आदि अंतरजाल पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, उन्हें अग्रवाल सभा, मानव कल्याण संघ, लायंस क्लब, सहित अनेक सामजिक एवं साहित्यिक संस्थाओं उनकी साहित्यिक प्रतिभा तथा साहित्यिक समर्पण के लिए सम्मानित किया है हाल ही में उन्हें सांस्कृतिक मंच, भिवानी ने राज्य स्तरीय राजेश चेतन काव्य पुरस्कार से सम्मानित किया है।

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रसखान

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आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रसखान का परिचय इस प्रकार दिया है- ”ये दिल्ली के एक पठान सरदार थे। इन्होंने ‘प्रेमवाटिका’ में अपने को शाही खानदान का कहा है। संभव है पठान बादशाहों की कुलपरंपरा से इनका संबंध रहा हो। ये बड़े भारी कृष्णभक्त और गोस्वामी विट्ठलदास जी के बड़े कृपापात्र शिष्य थे। ‘दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता’ में इनका वृत्तांत आया है। उक्त वार्ता के अनुसार ये पहले एक बनिए की लड़की पर आसक्त थे। एक दिन इन्होंने किसी को कहते हुए सुना कि भगवान् से ऐसा प्रेम करना चाहिए जैसे रसखान का उस बनिए की लड़की पर है। इस बात से मर्माहत होकर ये श्रीनाथ जी को ढूंढते-ढूंढते गोकुल आए और वहाँ गोसाईं विट्ठलदास जी से दीक्षा ली। यही आख्यायिका एक-दूसरे रूप में भी प्रसिध्द है। कहते हैं, जिस स्त्री पर ये आसक्त थे वह बहुत मानवती थी और इनका अनादर किया करती थी। एक दिन ये श्रीमद्भागवत का फारसी तर्जुमा पढ़ रहे थे। उसमें गोपियों के अनन्य और अलौकिक प्रेम को पढ़ इन्हें ध्यान हुआ कि उसी से क्यों न मन लगाया जाय जिस पर इतनी गोपियाँ मरती थीं। इसी बात पर ये वृंदावन चले आए।
इन प्रवादों से कम से कम इतना अवश्य सूचित होता है कि आरंभ से ही ये बड़े प्रेमी जीव थे। वही प्रेम अत्यंत गूढ़ भगवद्भक्ति में परिणत हुआ। प्रेम के ऐसे सुंदर उद्गार इनके सवैयों में निकले कि जनसाधारण प्रेम या शृंगार संबंधी कवित्ता सवैयों को ही ‘रसखान’ कहने लगे- जैसे ‘कोई रसखान सुनाओ’। इनकी भाषा बहुत चलती, सरस और शब्दाडम्बर मुक्त होती थी। शुध्द ब्रजभाषा का जो चलतापन और सफाई इनकी और घनानंद की रचनाओं में है वह अत्यंत दुर्लभ है। इनका रचनाकाल संवत् 1640 के उपरांत ही माना जा सकता है क्योंकि गासाईं विट्ठलदास जी का गोलोकवास संवत् 1643 में हुआ था। प्रेमवाटिका का रचनाकाल संवत् 1671 है। अत: उनके शिष्य होने के उपरांत ही इनकी मधुर वाणी स्फुरित हुई होगी। इनकी कृति परिमाण में तो बहुत अधिक नहीं है पर जो है वह प्रेमियों के मर्म को स्पर्श करनेवाली है। इनकी दो छोटी-छोटी पुस्तकें अभी तक प्रकाशित हुई हैं- प्रेमवाटिका (दोहे) और सुजान रसखान (कवित्ता सवैया)। और कृष्णभक्तों के समान इन्होंने ‘गीतिकाव्य’ का आश्रय न लेकर कवित्ता सवैयों में अपने सच्चे प्रेम की व्यंजना की है।”

स्रोत : आचार्य रामचंद्र शुक्ल; हिन्दी साहित्य का इतिहास; नागरीप्रचारिणी सभा, काशी; संस्करण संवत् 2035; पृष्ठ- 131-132

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