अमराई लद गई बौर से फिर पलाश फूले।

पुरवाई ने खूब बजाई कमरे की सांकल,
रोशनदानों पर गौरैया करती है हलचल,
लटक लटक कर परदों से तितली आकर झूले।

सब हैं पर एकाकी हूं मैं पीर लिये अपनी,
मौलसिरी के गमलों में उग आयी नागफनी,
कभी कभी चुभने लगते हैं दिन बिसरे भूले।

एक अधूरापन खालीपन मेरे साथ रहा,
तब भी जब मेरे हाथों में तेरा हाथ रहा,
सब सपने बैसाखी पर हैं सब लंगड़े लूले।

-ज्ञान प्रकाश आकुल