नया कपड़ा बुनने से कहीं मु्श्क़िल है
फटे कपड़े को रफ़ू करना!

….आँखें गड़ा-गड़ा कर,
पिरोना होता है एक-एक तार,
छूटे-टूटे ताने-बाने के साथ

रवां करना होता है नया धागा
और बनाना होता है उसे
कपड़े का एक हिस्सा!
इतने के बाद भी
ख़त्म नहीं हो जाता
मसअला!
बेशक़
कारीगरी की क़रामात
दे सकती है चकमा
सारी दुनिया को

…लेकिन हम भरे रहते हैं
इस अहसास से
कि हमने जो ओढ़ा है
वो साबुत नहीं रफ़ू किया गया है!

© संध्या गर्ग