पुस्तक-समीक्षा

एक बड़े सामाजिक सरोकार की कविताएं

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कृति- अनचाही
विधा- कविता
कवि- मिथिलेश जैन
प्रकाशन- मेधा बुक्स, नवीन शाहदरा, दिल्ली
मूल्य- रु 250/-

हाल ही में श्रीमती मिथिलेश जैन का कविता संग्रह अनचाही (2012) सामने आया है। इस संग्रह की 100 से ऊपर समस्त कविताएँ कन्या भ्रूण हत्या को केन्द्र में रखकर लिखी गई हैं। एक ही थीम पर, वह भी एक बड़े सामाजिक मुद्दे को लेकर लिखी गईं इस तरह की संवेदनात्मक कविताएँ कम से कम मुझे तो पहली बार पढ़ने को मिली हैं।
‘अनचाही’ -जैसा कि संग्रह के शीर्षक से ही व्यक्त है, परिवार के न चाहने के कारण जन्म से वंचित की जाने वाली कन्या-भ्रूण का हृदय को उद्वेलित कर देने वाली आवाज का नाम है। जन्म ले भी ले तो परिवार और समाज के लिए भी वह ‘अनचाही’ ही बनकर रह जाती है। इस पीड़ा को भी ये कविताएँ पूरी संवदेना के साथ मुखर करती हैं। सवाल केवल अस्मिता का नहीं है – अस्तित्व का है। जीवन का है। संग्रह की प्रथम कविता ही अजन्मी कन्या के अपनी माँ को सम्बोधित है, जो बेटों की चाहत में अपनी बलि न देने की निरीह पुकार है। (माँ! मेरी बलि न दो) यह मार्मिक आवाज़ मानो कविता के पाठक/पाठिका को रह-रहकर सुनाई देती है – माँ प्यार से आँचल में खिलने का अवसर दो।
यह स्वर कवयित्री ने अपनी अनेक कविताओं में अलग-अलग प्रसंगों, संदर्भो और स्थितियों में मुखरित किया है। यह कोमलतम स्वर जैसे अजन्मी कन्या की धड़कनों से आ रहा हो। यह इन कविताओं के प्रभाव की शक्ति भी बन गया है। कवयित्री जहाँ ‘कचरे के डिब्बे’ के पास होकर गुज़र जाने वाली भीड़ को देखकर आहत है, कि कोई उस कचरे का डिब्बे में डाल दी गई कन्या भ्रूणों की ओर ध्यान नहीं दे रहा; वहीं निरर्थक हो चले – ‘बेटी बचाओ, बेटी बचाओ’ के शोर के बीच भोंथरी हो गई संवदेनाओं और ऐसे नारों के खोखलेपन की ओर हमारा ध्यान खींचती है। (आज का यक्ष प्रश्न, पृष्ठ 15) वे ‘बेख़बर अनजान दौड़ती दुनिया’ को ‘आने वाले चक्रवात की आहट’ से सचेत करती हैं। और इसका प्रतिफलन उनकी कई कविताओं में होता है, जैसे-कहाँ गई ये गुमशुदा बेटियाँ, बेटियाँ मिटाओगे तो मिट जायेगी ये धरा, परिदृष्य-2050, राखी का त्योहार इतिहास हो जाएगा आदि-आदि।
एक कन्या आख़िर हमसे क्या चाहती है? प्यार, दुलार, जीने का अधिकार, घर-परिवार और समाज में अपनी सम्मानजनक उपस्थिति… अपनी पहचान…। इन पंक्तियों में मिथिलेश जी ने इतनी मार्मिक बात कही है-
न कुल-दीपक बनने की चाहत / न उत्ताराधिकार की अभिलाषी / हृदय वेदना सुना रही हूँ / माँ! मैं तेरी राजदुलारी! माँ! मैं तेरी राजदुलारी, पृष्ठ 24
और इस कविता का अंत होता है- हम रह जायेंगी बस / कहानी और विचारों में / आने वाला कल ढूंढेगा / हम को चाँद-सितारों में।
वे नारी की उपलब्धियों को भी रेखांकित करती हैं, उसकी शक्ति को भी। उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या के विविध आयामों को उद्धाटित किया है, जो इस संग्रह की महती उपलब्धि है। नारी को देवी मानने की समाज की चालाकी को, नारी-द्वारा ही कन्या-भ्रूण हत्या के कृत्य को, इसी तरह के अन्य घटकों को उद्धाटित करते हुए वे आज की आधुनिक स्त्री को नयी चेतना देती है, कि कन्या भ्रूण हत्या से बचें। इसके लिए स्वयं नारी को ही निर्णय लेना होगा – तब बनेगी ‘कम्लीट फैमिली’ (पृष्ठ 128)। यह कविता पति के हृदय का परिवर्तन भी कर देती है, पत्नी के निर्णय से। उनकी कविताओं में नन्हीं अजन्मी कन्या ही माँ को सही निर्णय लेने, रूढ़ियों को साहसपूर्वक तोड़ने और अपने को इस संसार में आने के लिए प्रेरित करती है। यथा -
ठुकरा दो वो सब कुरीतियाँ / जड़ता से ग्रसित समाज की / बाधक जो मेरे /  जीने का अधिकार की। थामो नहीं मेरी गति, पृष्ठ 18
अथवा
माँ! / तुम क्यों नहीं तोड़ती / भेदभाव की ये दीवार ? (पृष्ठ 20)
अथवा
मुझे दया आती है / तेरी जैसी बुजदिल माँ पर / तू ग़लत सोचती है कि मैं तेरे निबोहरे करूंगी / मैं तो स्वयं ही नहीं आना चाहती / इस भेदभावपूर्ण संसार में …(पृष्ठ 32)
अर्थात् वह नन्हीं-सी धड़कती जान कितनी ही कोमल क्यों न हो, उसका जो स्वर कवयित्री ने सुना है वह कमज़ोर नहीं है। कई कविताओं में मासूम से प्रश्न के एक नन्हें आघात से माँ की पश्चाताप भरी वेदना भी जागृत हो उठती है। उन्होंने अपने भीतर की पीड़ा को इन कविताओं में प्रतिष्ठित कर समाज को दिशा देने की सफल चेष्ठा की है। यहाँ एक स्त्री और पुरूष प्रधान समाज आमने-सामने हैं। ये कविताएँ निश्चय ही स्त्री जीवन की और उस ब्याज से स्वस्थ समाज की पक्षधर हैं।
अंत में एक कविता की ये पंक्तियां, जो मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत प्रभावित करती हैं-
जब एक माँ / अपनी बेटी की आँखों में / अपना प्रतिबिम्ब देखती है / तब बेटी भी / उसकी आँखों में अपने को / प्रतिबिम्बित होते देख लेती है / और शुरू हो जाता है / युगों-युगों से चला आ रहा / एक सिलसिला / माँ-बेटी के बीच / एक अदृश्य बंधन का। (आकाशवृत्ता, पृष्ठ 170)

-डॉ. हरीमोहन
निदेशक
क मु हिन्दी तथा भाषा विज्ञान विद्यापीठ
आगरा
मो:- 09412256333

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दस्तावेजी महाकाव्य : सत्तावनी श्रध्दांजलि

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कृति : सत्तावनी श्रध्दांजलि
विधा : महाकाव्य
रचनाकार : डॉ. गुरु प्रसाद ‘शुभेश’ भट्ट
सम्पादक : डॉ. ए.के.पाण्डेय
प्रकाशक : राजकीय संग्रहालय, झाँसी
मूल्य : रु 75/-
पृष्ठ : 124

डॉ. गुरु प्रसाद शुभेश प्रवृत्ति और पेशे से चित्रकार हैं। अन्वेषी स्वभाव के कारण संभवत: उन्होंने चित्रकला में डॉक्टरेट किया है। सन् 1957 में उन्होंने कला शिक्षक के रूप में चित्रकला का शिक्षण प्रारंभ किया, जो अनवरत् झाँसी के ऐतिहासिक विद्यालय, ‘बिपिन बिहारी इण्टरकॉलेज’ से जून 1994 में सेवानिवृति तक चलता रहा। वैसे वे स्वयं में कला शिक्षण संस्थान रहे हैं। चित्रकला शिक्षण को समर्पित लगभग तीस संस्थाओं के संस्थापक डॉ. शुभेश रहे हैं। आज झाँसी के अस्सी प्रतिशत से अधिक स्थापित तथा प्रयासरत चित्रकारों ने डॉ. शुभेश से किसी न किसी प्रकार कुछ न कुछ सीखा है। झाँसी रेलवे स्टेशन सहित देश के तमाम सरकारी-ग़ैर सरकारी संस्थानों में डॉ. शुभेश की पेंटिंग्स सज्जित हैं।
हिन्दी, अंग्रेजी, अवधी, बुन्देली भाषाओं/बोलियों में पारंगत डॉ. शुभेश एक महाकवि होने की हैसियत भी रखते हैं, यह उनकी काव्य-पुस्तक ‘सत्तावनी श्रद्वांजलि प्रकाशित होने पर ही जान सके।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के चरित गायकों का सिलसिला संभवत: स्वर्गीया सुभद्रा कुमारी चौहान से भी पहले से आज तक चला आ रहा है। लेकिन डॉ. शुभेश इस सिलसिले की कड़ी नहीं हैं। वे इसलिए स्वयं में मौलिक हैं कि उनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति ने रानी झाँसी को अति मानवी मानने से इनक़ार किया है। गहन शोध और घटनाओं की तार्किकता के आधार पर उन्होंने बजबजाती भावुकता से हट कर स्त्री-शक्ति के सर्वोच्च प्रतिमान के रूप में रानी को सत्तावनी श्रध्दांजलि में प्रतिष्ठित किया है।
महाकाव्य के संपादक डॉ. ए के पाण्डेय के शब्दों में कहें तो ‘यह काव्यमय श्रध्दांजलि, छिपे इतिहास को सामान्य पाठकों तक लाने का प्रयास है।’
जहाँ तक छिपे इतिहास को खोजने का प्रश्न है तो इस संबंध में डॉ. शुभेश की समझ है-
जीवन-विकास का प्रकाश कहीं से आप,
आने दो, उस जैसा उज्ज्वल भविष्य का तूर्ण कहाँ?
उनकी तिलमिलाहट यह है कि उनके शहर के लोग जानकारियों को गुप्त रखने विश्वास करते हैं। उन्हें बाहर नहीं आने देना चाहते हैं। ज़्यादातर प्रकरणों में तो भ्रामक सूचनाएँ देते हैं-
सूचना ग़लत देत बुध्दि मन मथ देत
यह स्थिति तथ्यों को कहीं गहरे दफ्न कर देती है। मिथकों को इतिहास की तरह स्थापित कर देती हैं। लेकिन डॉ. शुभेश ने ऐसी तर्कहीन जानकारियों/मिथकों को मानने से इनक़ार किया है। चाहे वह रानी के दामोदर राव को पीठ पर बांध कर क़िले से छलांग लगाने का प्रसंग हो या वीर रस की झोंक में पत्थर के स्तम्भ को तलवार से काटने की बात हो। ऐसी कनबतियों को डॉ. शुभेश ने ललकारा है। रानी के इतिहास को विज्ञान सम्मत बनाने के लिए कहा है-
‘रानीकूदी’ थीं किला से कुदवान कोउ, पीठि बांधि
कूद कर कबहू दिखावै कोउ?
महल-खम्भ काटिबे को, कोऊ बनैना वार
पूरे फल-धार की तरवारि तो बतावै कोउ॥
पत्थर कटत नैइयाँ, टूटत सुधैयाँन सूध
तिरछी तरवारि मारि, काटि कै दिखावै कोउ?
जे उपहास बिन्दु, इनको मिटाव अब,
इन्दु-यश रानी को, वैज्ञानिक बनाव कोउ!
पुस्तक के अधिकांश द्वन्द बुन्देली में लिखे हैं लेकिन अभिव्यक्ति में भाषा आग्रह नहीं है। इसके लिए ‘इल्ट्रॉयड’, ‘बाइ-सेप्स’, ‘स्केपुना’ जैसे अंग्रेजी के तकनीकी शब्द आते हैं तो उनका भी बुन्देली छन्दों में स्वागत हुआ है।
महाकाव्य को लेकर डॉ. शुभेश कितने गंभीर रहे हैं, कितना परिश्रम किया है उन्होंने, यह समझने के लिए उनका आत्मकथ्य (कुछ इधर की, कुछ उधर की) पढ़ना अपने-आप में रोचक है।
पुस्तक को प्रामाणिक बनाने के लिए मूल काव्य के अलावा पाँच खण्डों में बाँटा गया है। इनमें ‘झाँसी का मानचित्र’, ‘मानचित्र-परिचय’, ‘झाँसी राज्य पर अमलदारी का काल-विभाजन’, ‘संदर्भ’, ‘किले का रेखांकन (डॉ. शुभेश द्वारा चित्रांकित) मय परिचय के सहित नौ परिशिष्ट समाहित हैं।
जबकि छंदबध्द रानी चरित् को ‘मंगल-आचरण’, ‘प्रभाव’, ‘प्रवाह’, ‘झाँसी-झलक’, ‘राज्याभिषेक’, ‘कुँवर सागर सिंह’, ‘मेला में झमेला’, ‘सैन्य-अभियान’, ‘झाँसी का किला-परिचय’, ‘बारह द्वार’, ‘बारह उपद्वार’, ‘सावधान’, ‘तैयारी’, ‘युध्द’, ‘पटल परिवर्तन’, ‘सर्व वै पूर्णयज्ञं स्वाहा’, ‘ग्वालियर’, ‘पुन: झाँसीपुरी’, ‘श्रध्दांजलि’ शीर्षकों में विभाजित किया गया है।
मुझे लगता है कि यह पुस्तक अगर गद्य में लिखी जाती तो इसकी ‘अप्रोच’ ज्यादा व्यापक क्षेत्र तक हो सकती थी। जैसी कि डॉ. शुभेश की ही अंग्रेजी में लिखी एक अन्य पुस्तक ‘देवगढ़ एन अन-अर्थली प्लेज़र’ है।
छंव, वह भी बुंदेली भाषा में आम पाठकों को पुस्तक से विरत् कर सकते हैं। हालाँकि डॉ. शुभेश ने बुन्देली के अप्रचलित शब्दों के अर्थ संदर्भ में दिए है लेकिन इनकी संख्या इतनी अधिक है कि लगातार पढ़ने का क्रम भंग होता रहता है। इतिहास या विज्ञान का पाठक तो इस क्रम-भंग का आदी होता है, सामान्य पाठक नहीं।
यह सोचकर ही सिहरन होने लगती है कि कुल 203 छंदों के लिए 2031 संदर्भ-बिन्दु दिए गए हैं। संभवत: अंतिम दो छन्द ही ऐसे हैं जिन्हें संदर्भ से मुक्ति मिली है।

-दिनेश बैद्य

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ग़लत समय पर प्रकाशित सही कविताएँ

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कृति- अतीत के प्रेत
विधा- कविता
कवि- जगदीश सविता
प्रकाशन- सारांश प्रकाशन
मूल्य- रु 100

‘अतीत के प्रेत’ जगदीश सविता जी का एक ऐसा काव्य-संग्रह है, जिसमें पौराणिक और मिथकीय पात्रों-चरित्रों और घटनाओं के माध्यम से कवि हमारी संस्कृति की जड़ों में बैठे ढकोसलों की बड़ी बारीक़ी से पड़ताल करता है। वह सदियों से महिमा-मंडित किए जाते रहे देवतुल्य या स्वयं अवतार कहे जाने वाले चरित्रों की भी पोल खोलता है, उनसे सवाल करता है और उनकी दिव्यता को, उनके अस्तित्व को कठघरे में खड़ा करता है। वह पुराणों और मिथकों में से ही ऐसे चरित्र, ऐसी घटनाएँ ढूंढ लाता है, जो गवाह हैं इस बात की, कि कमज़ोर का शोषण हर हाल में, इस काल में होता रहा है, होता रहेगा। इससे छुटकारा तभी संभव है जब हम अपनी ऑंखों से अंधविश्वास की पट्टी हटाएँ, अपने विवेक को जागृत करें, हर वर्ग का, हर व्यक्ति शिक्षित हो, ताकि सुनी-सुनाई मन-गढ़न्त बातें उसके जीवन का मार्ग निर्धारित न करें। वह अपना सत्य स्वयं खोजे, उसे जाँचे-परखे, चाहे उसे हज़ारों-लाखों बार गिरना पड़े, मुँह की खानी पड़े।

…पात्र हैं महाभारत के
एक से बढ़कर एक
लम्पट शान्तनु
कुण्ठाओं का गट्ठड़ भीष्म
भाड़े का टट्टू द्रोण
और निरीह शिशुओं का हत्यारा
उसका कुलदीपक
दूरदर्शी संजय
अंधा धृतराष्ट्र
फूट चुकी हैं जिसकी
हिय की भी!
….और पहलवान भीम
नपुंसक धनुर्धारी
और उसकी गाड़ी खींच ले जाने वाला
छलिया कृष्ण
जिसे भगवान मानने में ही ख़ैर
ये सभी
मानो चिल्ला चिल्लाकर कह रहे हों
”हम आज भी हैं
महाभारत कभी ख़त्म नहीं होता”

कवि इन मिथकों में, पुराणों में सच्चा इतिहास ढूंढता है और हताश होकर मात्र कविता में, या कल्पना में थोड़ा-बहुत सत्य बचे रह जाने से ही संतोष करता है, पर साथ ही झूठ के पुलिंदों से दूर रहने को आगाह भी करता है-

‘लाश घर’ है इतिहास
एक एल्बम है जिसमें
महलों के
षडयंत्रों के
युध्द के मैदानों के
कहाँ है प्राणवन्ता?
रंग… रूप… रस?
कहाँ हैं धड़कनें?
आहें?
वह तो भला हो कल्पना का।

वाक़ई इतिहास में ज़िक्र है राजाओं का, रानियों का, देवों का, अवतारों का, युध्दों का, पर कहाँ गई वो युध्द में हताहत हुए सैनिकों की सूची? कहाँ गई उन स्त्रियों की, बच्चों की चीखें, कहाँ गया उन लाखों-करोड़ों मनुष्यों के रक्त का हिसाब, जो कट गए किसी एक व्यक्ति के स्वार्थ के लिए,किसी एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा के लिए। क्यों उनके लिए नहीं चला सुदर्शन चक्रद्व क्यों उनकी रक्षा के लिए नहीं अस्त हुआ समय से पूर्व सूरजद्व क्यों नहीं शहीद हो गए मुस्कुराते हुए महानायक युध्द में-

यदि तुम चाहते तो
रुक सकता था महासमर!
तुम्हें तो मालूम था योगिराज!
विषाद ही तो है
योग के सोपान का प्रथम पायदान
आत्मग्लानि में डूबा
द्रवितमना अर्जुन
क्या ज़रूरत थी
उस सत्रह अध्याय लम्बे वाग्जाल की?
…बच सकते थे अठारह अक्षौहिणी जीवन
यदि तुम चाहते तो!

जगदीश सविता जी की कविताएँ उस समय की कविताएँ हैं जब आज़ादी के बाद लोग सकारात्मक बदलाव के सपने देख रहे थे। कविता छन्दों से निकल कर मुक्त हो रही, रोज़मर्रा की ज़िन्दगी को आम आदमी के शब्दों में कहा जा रहा था। यूँ कहें कि नई कविता की नींव पड़ रही थी, जब मुक्तिबोध को, उनकी कविताओं को बहुत बड़ा कवि वर्ग नकार रहा था और वहीं-कहीं मुक्तिबोध के लिए, उनकी कविता के लिए ज़मीन तैयार हो रही थी-

क्या दिन थे वे भी…
रोज़ तीन टांग वाले स्टोव पर
वह मेरा चाय बनाना
गली के काणे कुत्ते का
हिज़ मास्टर्स वाइस के पोज़ में
आ बैठना…
…कई एकड़ में फैली
नवाब साहब की हवेली में
खुलेगा
एक दिन ज़रूर खुलेगा
कम्यूनिस्ट पार्टी का दफ्तर
लहराएगा लाल परचम
…हाँ तो पहलवान
देना एक बीड़ी
माचिस है मेरे पास
…..क्या दिन थे!

कवि बुरे हालातों में भी एक मस्त कलन्दर की ज़िन्दगी जीता है, घोर निराशा के क्षणों में भी उम्मीद रखता है, लाल परचम लहराने की। साधनहीन खड़ा है पर बेबाक़ी से मांग सकता है, छीन सकता है साधन क्रांति के….. क्योंकि ‘माचिस है उसके पास’।
सच ही है। जगदीश सविता की कविताएँ चिंगारियाँ हैं, जो सीनों में दबे बारूदों को धमाकों में बदल सकती हैं। पर अफ़सोस कि ये कविताएँ ऐसे समय में सामने आ रही हैं जब सारी पार्टियों के चेहरे से नक़ाब उतर चुके हैं। क्रान्तियों की दिशा बदल चुकी है। युवाओं का आन्दोलन वंचितों का आन्दोलन एक अंधी हिंसक लड़ाई में तब्दील हो गया है। ऐसे मैं इन कविताओं को पूरे एहतियात के साथ, उस समय से जोड़ कर पढ़ा जाना चाहिए, जिस समय में ये लिखी गई थीं।
जगदीश सविता जी के पाँच काव्य-संग्रह हिन्दी में तथा एक काव्य संग्रह अंग्रेजी में प्रकाशनाधीन है।

-विवेक मिश्र

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अनुत्तरित प्रश्नों की प्रतिध्वनि

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कृति- शब्दों का कोहरा
विधा- कविता संग्रह (अनुवाद)
कवि- वीरभद्र कार्कीढोली
मूल नेपाली से अनुवाद- खड्गराज गिरी
प्रकाशक – दोभान प्रकाशन, सिच्छे गंगटोक

‘शब्दों का कोहरा’ वीरभद्र कार्कीढोली की मूलतः नेपाली में लिखी गई कविताओं के हिन्दी अनुवादों का संग्रह है। वीरभद्र एक ऐसे कवि हैं जो नेपाली, हिन्दी, अंग्रेज़ी और असमिया में एक साथ लिखते हैं। उनके अभी तक सात कविता-संग्रह एवं एक कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।
कार्कीढोली के लिए ज़िंदगी और कविता दो अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं। उन्हीं के शब्दों में कहें तो “ज़िंदगी से अलग हम कोई दूसरी यात्रा के यात्री नहीं हैं। दरअसल हो ही नहीं सकते। ज़िंदगी से अलग कोई ज़िंदगी नहीं है। वस्तुतः ज़िंदगी के ही इर्द-गिर्द ज़िंदगी की तलाश कर रहे हैं हम। कोई हँसता नहीं है ख़ुशी से, आनन्द से। हँसने वाले सभी रो रहे हैं। अन्दर ही अन्दर अपनी अन्तर पीड़ा से।”
कार्कीढोली बदलाव के कवि हैं। ज़िंदगी में और कविता में, हर समय कुछ नया बोना चाहते हैं। वर्जनाओं से, रूढ़ियों से मुक्त होने की एक क़ोशिश करना चाहते हैं-
कई दिन हुए
एक ही भजन दोहरा रहे हैं लोग-
इस शहर के प्रसिद्ध मन्दिर में,
भीड़ चाहती है नए भजन सुनना
पर मनचाहा भजन सुने बिना ही
घनी रात्रि में
दीया बुझा कर
बेचारे पुजारी ने आत्मह्त्या कर ली
प्रभु के मन्दिर में ही।

कार्कीढोली की कविताएँ सतत् संघर्षों और नई यात्राओं की कविताएँ हैं। एक ऐसे संघर्ष की कविताएँ जो देश-काल-पात्र बदलने पर भी समाप्त नहीं होता। बस मुखौटे बदलता है।

मैं तो हिमालय देखने आया था
तुम्हारे भीतर का
भरा हुआ और पिघला हुआ
देखूंगा सोचा था
पर ऊँचाईयाँ आँकने
नहीं आया था मैं………
बहुत ऊँचाई तक चला हूँ
और अभी उतना ही चलना है…
……पर पुनः मैं वही ग़लती दोहराने
उसी जगह आ पहुँचा।
फिर उसी जगह आ पहुँचा!!

बाज़ारवाद की आंधी में ध्वस्त होती मान्यताओं के बीच लगातार शोषण का शिकार होते आदमियों की भीड़ में से ही एक कवि भी है जो डर रहा है अपने लिए, अपने जैसे और लोगों के लिए और डर रहा है ध्वस्त होती आस्थाओं और जीवन मूल्यों के लिए-
पक्षी अब तक नहीं लौटे
एक-एक कर गिर रहें हैं पत्ते
हवा भी नहीं बह रही है ख़ूब!
गिरने को है वह पहाड़!
गिर सकता है : किसी रात, किसी दिन
या नहीं तो शाम को
खड़ी थी वहीं पर मेरी भी आस्थाएँ!

वीरभद्र कार्कीढोली की कविताओं में जीवन के नैराश्य का चरम है। जीवन के दुखों की चमक है और सन्नाटे में भारी-भरकम पहाड़ों के नीचे दबी कई अनसुनी चीख़ें हैं, जिन्हें ध्यान से जोड़कर सुनने पर एक ऐसी कविता बनती है जो समूची मानव जाती के दर्द का, उसकी पीड़ा का, उसके आर्तनाद का प्रतिनिधित्व करती है। उनकी कविताएँ समस्याओं के उत्तर नहीं हैं, बल्कि सदियों से अनुत्तरित प्रश्नों की प्रतिध्वनियाँ हैं। उन्हें सुनकर अगर कोई जवाब आपको सूझे तो कवि को लिखियेगा।
वीरभद्र कार्कीढोली की कविताएँ शीघ्र ही आप ‘काव्यांचल’ पर पढ़ सकेंगे। वे अपने परिवार के साथ गैंगटॉक, सिक्किम में रहते हैं।
-विवेक मिश्र

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दोहे का दर्शन

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विधा- पत्रिका
पत्रिका- सरस्वती सुमन
अंक- जुलाई-सितम्बर 2010 (दोहा-विशेषांक)
संपादन – आनंद कुमार सिंह
अतिथि संपादक- अशोक ‘अंजुम’

त्रैमासिक पत्रिका ‘सरस्वती सुमन’ का दोहा विशेषांक दोहों को उनकी समग्रता के साथ पुनः स्थापित करने का एक प्रयास है। पत्रिका के संपादक आनंद सुमन सिंह तथा अतिथि संपादक अशोक ‘अंजुम’ हैं। पत्रिका में हिन्दी काव्यधारा में दोहों का इतिहास, उनके प्रकार, उनका महत्व एवं उनके गुणों को उजागर करते लेख एवं साक्षात्कार हैं, जिसमें अतिथि संपादक अशोक ‘अंजुम’ की वरिष्ठ कवि गोपाल दास ‘नीरज’ एवं सहित्यकार देवेन्द्र शर्मा ‘इंद्र’ से की गई बातचीत, दोहों के विषय में चर्चा को नए आयाम देती है। दोहों के प्रकारों पर प्रकाश डालता डॉ. रामस्नेही लाल शर्मा ‘यायावर’ का लेख नए दोहाकारों के लिए विशेषकर पठनीय एवं संग्रहणीय है। दोहों में मात्राओं के महत्व को बताता चंद्रपाल शर्मा का लेख भी शोधपरक है।
विशेषांक में संत दादू के दोहों से लेकर नई पीढ़ी के लगभग 125 दोहाकारों को शामिल किया गया है। इससे स्वतः ही दोहों की यात्रा एवं विकास का भान हो जाता है।
यूँ तो विशेषांक में वर्तमान समय के रचनाकारों को ही प्रमुखता से छापा गया है, परन्तु दोहों की विरासत की चर्चा हो और कोई संत कबीर को नज़र अंदाज़ करे, यह बात खलती ही नहीं बल्कि सीधे-सीधे दोहों की चर्चा में कबीर की अनदेखी किसी भी तरह गले नहीं उतरती। शायद ही कोई रचनाकार यह भूल सकता हो कि हिन्दी कविता के इतिहास में कबीर और दोहे एक-दूसरे के पर्याय हैं।
विशेषांक के मुख्य पृष्ठ पर छपा चित्र विशेषांक की सामग्री के कतई अनुकूल नहीं है, जबकि भीतर के पृष्ठों पर छपे रेखाचित्र जो अतिथि संपादक अशोक ‘अंजुम’ के हैं, बहुत प्रभावशाली एवं सामग्री के अनुकूल हैं। अंक में पिछले दशक में छपी महत्वपूर्ण सतसईयों की भी अनदेखी की गई है, जिससे धर्मप्रकाश गुप्त जैसे बड़े दोहाकार अंक से बाहर हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कवि ‘त्रिफ़ला’ जो दोहों और सतसईयों के लिए जाने जाते हैं, उनकी सुध भी नहीं ली गई है। उसका कारण अधिकांश रचनाकारों का चुनाव मंचीय कवियों में से ही किया गया है, जिससे अधिकांश दोहों में विषयों की पुनरावृत्ति का दोष तो आया ही है, साथ ही कुछेक दोहे बहुत हल्के, चलताऊ और अर्थों में बहुत उथले प्रतीत होते हैं। विशेषांक के अंत में दिए दोहे से ही यदि यह बात करें तो यूँ होगी -

सब कुछ उल्टौ हो गयौ, भयौ बुरौ सब फेर।
तुलसी, सूर, कबीर सब देख रहे अंधेर।।

दोहों को अपनी तुकों, मात्राओं और लय के कारण ही नहीं बल्कि अपने भीतर छुपे गूढ़ दर्शन और जनहित के लिए दिए गए संदेशों और शिक्षाओं के लिए भी प्रमुखता से जाना जाता है। आज दोहों का प्रयोग हल्के, चलताऊ जुमलों या नारों की तरह तालियाँ बटोरने के लिए हो रहा है। दोहा दरअसल दर्शन को समेटकर उसे संक्षिप्त कर जन-साधारण तक पहुँचाने के लिए लिखा जाता था, इसकी भाषा लोक-भाषा होती थी पर इसके अर्थों की कई पर्तें होती थीं। दोहों के गुणों की इस कसौटी पर कुछ ही दोहाकार आज खरे उतरते हैं। विशेषांक के कुछ दोहे-

इसक अलद की जात है, इसक अलह का अंग।
इसक अलद औजूद है, इसक अलद का रंग॥

-संत दादू

अभी नहाया है छुरा, लगी सड़क पर भीड़।
घबरा कर दुखने लगी, बड़े-बड़ों की रीढ़॥

राजपथों पर खो गया, जीवन का भूगोल।
ख़ाका सब पूरा हुआ, ख़ास बात है गोल॥

-म ना नरहरि

देख-देख पर्यावरण, बहा रहा है नीर।
ताजमहल किससे कहे, अपने मन की पीर॥

आसमान को छू रहे, आलीशान मकान।
तरस रहे हैं धूप को, घर के रोशनदान॥

-अंसार कंबरी

बेशक़ मुझको तौल तू, कहाँ मुझे इनक़ार।
पहले अपने बाट तो जाँच-परख ले यार॥

-हस्तीमल हस्ती

अग्निपरीक्षा भी कहाँ जोड़ सकी विश्वास।
युग बीते, बीता नहीं, सीता का वनवास॥

-सरिता शर्मा

अर्थहीन कुछ ने कहा, कुछ ने अर्थातीत।
अव्याख्येय रहस्य-सा जीवन हुआ व्यतीत॥

-शिवओम अंबर

पत्रिका छः वर्ष में चवालीस अंक निकाल चुकी है। लगभग पौने दो सौ पृष्ठों का दोहों पर केन्द्रित यह अंक पाठकों को कई सिद्ध दोहाकारों की रचनाओं से रू-ब-रू होने का मौक़ा देता है। नए दोहाकारों को सीखने के लिए अंक में पर्याप्त सामग्री है।
पत्रिका का यह अंक ‘सारस्वतम’, 1-छिब्बर मार्ग, देहरादून- 248001 से मंगवाया जा सकता है।

-विवेक मिश्र

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अपनी जगह तलाशते एक विषय की स्थापना

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yuddharat aam aadmi

विधा- पत्रिका
पत्रिका- युद्धरत आम आदमी
अंक- पूर्णांक 101 (विशेषांक)
संपादन – सुशीला टाँकभौरे, रमणिका गुप्ता
कला संपादक- डॉ. सुधीर सागर
प्रकाशक- रमणिका गुप्ता फाउंडेशन

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ‘युद्धरत आम आदमी’ मात्र पत्रिका नहीं है। यह एक आंदोलन है। एक ऐसा आंदोलन जो तमाम आंदोलनों, अभियानों और क्रांतियों में नज़र-अन्दाज़ किया जाता रहा। हमेशा जिसे धकिया कर वार्ताओं से, योजनाओं से, किताबों और पत्रिकाओं से बाहर निकाला जाता रहा। यह ऐसा आंदोलन है, जो कभी किसी राष्ट्रीय पार्टी के एजेंडे में प्रमुखता नहीं पा सका। तथाकथित बुद्धिजीवियों ने, साहित्यकारों ने भी इसे छूने से परहेज़ किया। पत्र-पत्रिकाओं में, सहित्य में हज़ारों-लाखों की तदाद में रोज़ छपने वाले पन्नों में इस विषय को हाशिए तक पर जगह नहीं मिली।
रमणिका फ़ाउन्डेशन ने अपने तमाम प्रकाशनों के साथ ‘युद्धरत आम आदमी’ के माध्यम से समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे, अपनी जगह ढूंढ रहे लोगों को एक आवाज़ दी।
‘युद्धरत आम आदमी’ का पूर्णांक-101, 2009 – “सृजन के आईने में – मल-मूत्र ढोता भारत” जिसका संपादन रमणिका गुप्ता तथा सुशीला टाँकभौरे ने किया है, जो कि अंक-103 (अप्रेल-जून, 2010) के साथ पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ है।
जैसा कि अंक के मुख्य पृष्ठ से ही बिल्कुल साफ़ हो जाता है कि यह अंक बिना किसी लाग-लपेट के, बिना किसी दुराव-छुपाव के सीधे-सीधे उन लोगों की बात कर रहा है, जो सदियों से रोज़ सुबह उठकर अपने ही जैसे दिखने वाले इन्सानों का मल-मूत्र समेटने और उसे अपने सिर पर ढोकर घर, गाँव, शहर से दूर ले जाकर फेंकने जैसे अमानवीय काम को अंजाम देते हैं। यह काम करते हाथ एक दिन के लिए रुक जाएँ तो कितने ही घरों की सुबह भी ठहर जाए। आज इक्कीसवीं सदी में विकास का दम भरते, विश्व-शक्ति बनने का सपना देखते भारत की हवा उस समय निकल जाती है, जब कोई इन्सान अपने सिर पर मल-मूत्र ढोने जैसे काम को आज भी करने के लिए विवश दिखाई देता है और ऐसे लोगों की संख्या दस-बीस या सौ-दो सौ नहीं बल्कि हज़ारों-लाखों में है। आज भी ग्रामीण भारत में सैंकड़ों गाँवों-क़स्बों में हज़ारों परिवार रोज़गार के विकल्प के अभावों में, इस काम को करने के लिए मजबूर हैं।
अंक का संपादन पूर्णतया निष्पक्ष होकर निर्भीकता से किया गया है। अंक में विषय से संबन्धित दलित लेखन को उसकी अन्तर चेतना के साथ समाहित किया गया है।
आवरण चित्र एंव कला निर्देशन डॉ. सुधीर सागर का है। पत्रिका का मुख्य पृष्ठ ही विषय के बारे में बहुत कुछ कह जाता है। अंक में हिन्दी के साथ मराठी, गुजराती, तेलुगू के लेखकों को भी स्थान दिया गया है। अंक में कहानी, कविता, पुस्तकों के अंशों, समीक्षात्मक आलेख एंव विवेचनात्मक मूल्यांकनों को, नाटक एवं लघुकथाओं को शामिल किया गया है।
रमणिका फ़ाउन्डेशन के इस प्रयास से अपनी जगह ढूंढते विषय एवं उस पर हो रहे लेखन और चिन्तन को पर्याप्त जगह मिली है। अंक की चर्चा भी रही। समस्या में गहराई से उतरने और उसे समझने का उन लोगों को भी मौक़ा मिला जो इस विषय में सोचने से पहले ही छि:-छि: कह के नाक पर रूमाल रखकर वेदों और पुराणों का हवाला देते हुए इसे पूर्वजन्मों का लेखा कह कर रास्ता बदल लेते हैं।
पत्रिका जो अब पुस्तक के रूप में है, उसने दलितों को सभी भुलावों से दूर हटकर वर्ण व्यवस्था की थोथी पट्टी न पढ़कर, उसे जलाकर नए भविष्य की नींव रखने का आह्वान करती है। नई व्यवस्था रचने को उकसाती है और जाति के आधार पर किसी को श्रेष्ठ या स्वयं को दलित समझकर इस कार्य से जुड़े रहने की थोथी दलील को सिरे से ख़ारिज करती है। दलित चेतना को जगाने की दिशा में यह एक मज़बूत क़दम है।
यह बात अजय नावरिया अपनी कविता में कुछ ऐसे कहते हैं:-
“शब्द थे, बहुत पहले से
पर मेरी मुट्ठियों में नहीं थे
कस कर बांध दिया था
उन्हें मेरी आँखों पर
ताकि देख न सकूँ उनके भीतर
अर्थ की चिल्लाती रोशनी को
बेशक़, मुट्ठी में आते ही
चकाचौंध हुई आँखें, पल भर को
……फिर बन गया वह
झरझर झरता झरना
……ये मेरी हथेलियों पर
पंख लगाए उड़ते शब्द
ये समूचे अस्तित्व में सेंध लगाते
इनके असीमित अर्थ ……

असीमित शब्दों को उघाड़ता नए आयाम रचता, चेतना का प्रकाश फैलाता यह अंक, सचमुच जड़ मान्यताओं की आँखें चुंधिया देगा। इसकी रोशनी का स्वागत किया जाना चाहिए।
-विवेक मिश्र

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जीवन के हर रंग की कहानियाँ

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कृति- हनियां तथा अन्य कहानियाँ
लेखक- विवेक मिश्र (9810853128)
विधा- कहानी
प्रकाशक- नेहा प्रकाशन
मूल्य- 125/-

हमारी ज़िन्दगी के पल एक-दूसरे से इस पेचीदग़ी से गुँथे हुए होते हैं कि उन्हें एक दूसरे से अलग कर पाना लगभग नामुमकिन जान पड़ता है। यह ऐसे ही है जैसे किसी वृत का आरंभ बिन्दु तलाशना! कहानीकार अपने जीवन की घटनाओं को एक दूसरे से विलगाते हुए उनका आदि तथा अंत तो ढूंढता ही है साथ ही उस पूरे कालखण्ड को इस सलीक़े से बयां करता है कि उसमें से भूत तथा भविष्य का हस्तक्षेप समाप्त हो जाता है।
कहानी कहने की यह बारीक़ी और शालीनता विवेक मिश्र की कहानियों में बार-बार दिखाई देती है। हनियां तथा अन्य कहानियाँ कुल नौ कहानियों की एक ऐसी पुस्तक है जिसमें सभी कहानियाँ लेखक के जीवन में घटित घटनाएँ तो हैं, लेकिन कोई भी एक घटना किसी भी दूसरी घटना से न तो प्रभावित है न सम्बध्द ही!
इन कहानियों को पढ़कर स्पष्ट होता है कि लेखक ने कृष्ण का सा जीवन जीने में विश्वास किया है। ऐसा जीवन जिसमें मथुरा, गोकुल, द्वारिका और कुरुक्षेत्र को परस्पर घालमेल कर पाना भी मुमकिन नहीं है और यह भी नकार पाना असंभव है कि इन चारों घटनाक्रमों का केन्द्र स्वयं कृष्ण ही हैं।
पिताजी की मृत्यु के अति संवेदनशील पल को पूरी गहनता से जीकर लेखक ने इस अंदाज़ में बयान किया है कि गुब्बारा कहानी को पढ़ते हुए कई बार पाठक इस पल को जी लेते हैं।
गमले कहानी में प्रकृति का रूपक लेकर किसी अपने का शब्दचित्र गढ़ने में पूरी तरह सफल हुए विवेक ने यह भी सिध्द किया है कि अच्छा लेखन बहुत लम्बा हो, यह आवश्यक नहीं है।
तीसरी कहानी है हनियां। लेखक ने साहित्य की सौम्यता को बनाए रखते हुए ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली मानसिकता पर ‘सत्यमेव जयते’ की नीति का प्रहार किया है। इस बात से इनक़ार नहीं किया जा सकता कि लेखक ने हनियां के चरित्र को न केवल अमर किया बल्क़ि तीन सिर वाले उस प्रेत का चित्र भी सार्वजनिक किया है जिसका जन्म इसी समाज से रोज़ाना होता है।
शब्दों से चित्र कैसे बनाया जाता है इसका श्रेष्ठ उदाहरण है गोष्ठी कहानी। इस कहानी में बुंदेलखंड के गली-गलियारों और कस्बाई जीवन की तस्वीर तो है ही साथ ही साथ समाज में सड़ रही संवेदनाओं की लाश का पंचनामा भी मौजूद है।
बड्डे गुरु और लोकतंत्र कहानी न होकर एक शालीन व्यंग्य है लोकतंत्र की वर्तमान दशा और सादगी के उपहास पर। दुर्गा में बचपन और धार्मिक आडम्बर दोनों की तस्वीर लेखक ने बखूबी उतारी है।
तितली कहानी मूलत: कहानी मात्र नहीं है, यह एक ऐसी आचार संहिता है जो महानगरीय जीवन जीने वाली और कैशोर्य के पायदान पर खड़ी हर लड़की को पढ़ लेनी चाहिए। मन की कोमल भावनाओं के नाम पर तन का कितना भयानक शोषण किया जा सकता है इसकी प्रतिध्वनि तितली कहानी में स्पष्ट सुनाई देती है। इसके साथ ही इस कहानी में एक और ख़ास बात यह है कि इसमें यह भी इंगित किया गया है कि नारी सशक्तिकरण के सारे नारे और नारी सशक्तीकरण के सारे दावे कितने खोखले और दिखावटी हैं इसका अहसास तभी होता है जब व्यक्तिगत स्तर पर इस विचार से जूझने का अवसर आए। इसके अतिरिक्त एक और महत्तवपूर्ण पहलू जो इस कहानी में नए सिरे से उजागर होता है वह यह है कि जब-जब सीता मर्यादा की लक्ष्मण रेखा पार करेगी तब-तब उसे रावण द्वारा अपहृत होना ही पड़ेगा।
इसके बाद की दोनों कहानियाँ, और चाहे जो भी कुछ हों पर उन्हें कहानी नहीं कहा जा सकता। हाँ इतना अवश्य है कि वे पुस्तक की अन्य कहानियों से कुछ अधिक ही सशक्त हैं। सृजन को जब भ्रष्टतंत्र की पेचीदगियों से जूझना पड़ता है तो उसकी कोमल पाँखुरियाँ कैसे मसली जाती हैं इसकी भयावह तस्वीर को लेखक ने एक लेखक की डायरी नामक कहानी में उकेरी है और आत्मकथ्य को आत्मकथ्य नामक ‘कहानी’ में ही लिखकर लेखक ने एक नया प्रयोग किया है, जो उनकी रचनाधर्मिता का गवाह भी है।
कुल मिलाकर पूरी पुस्तक पठनीय होने के साथ-साथ विचारणीय भी है।
प्रकाशकीय स्तर पर कुछ वर्तनी संबंधी अशुध्दियाँ हैं, जिनसे कहीं भी अवरोध तो उत्पन्न नहीं होता लेकिन उन्हें नज़रंदाज़ किया जाना भी संभव नहीं है। साज-सज्जा की दृष्टि से पुस्तक आकर्षक है और आवरण-पृष्ठ उतना ही सादा है जितनी विवेक मिश्र की कहानियाँ, हाँ कहानियों की गहन अंतरात्मा की तरह आवरण पृष्ठ पर भी एक गंभीर कलाकृति अवश्य सम्मिलित की गई है, जो पुस्तक के पूरे कथ्य को अपने में समेटने का प्रयास करती जान पड़ती है।

-चिराग़ जैन

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नयी पीढ़ी की सृजनशीलता का एक गुलदस्ता

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pahali-dastak

कृति- पहली दस्तक
विधा- कविता
संपादन- चिराग़ जैन (9311573612)
प्रकाशक- पाँखी प्रकाशन
मूल्य- 120/-

प्रत्येक संस्थान में नयी प्रतिभाओं की हमेशा दरकार रहती है। काव्य जगत् भी इस सत्य से अछूता नहीं है। हर दौर में नए रचनाकारों का समाज ने मुक्त हृदय से स्वागत किया है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए चिराग़ जैन ने 15 युवा कवि-कवयित्रियों की रचनाओं का संकलन किया है।
अलग-अलग तेवरों की रचनाओं की इस संकलन में मौज़ूदगी यह सिद्ध करती हैं कि हिंदी कवि-सम्मेलन मंच पर भविष्य में सभी रस और रंग देखने को मिलते रहेंगे। संकलन के पहले कवि और संपादक चिराग़ जैन की रचनाओं में प्रेम की पवित्रता का एहसास भी है और संवेदना की छुअन भी। माँ के व्यक्तित्व को वैराट्य से जोड़ते हुए चिराग़ कहते हैं-
मेरी अनपढ़ माँ
वास्तव में अनपढ़ नहीं है
वह बातचीत के दौरान
पिताजी का चेहरा पढ़ लेती है

उधर नील अपने बचपन को याद करते हुए कहते हैं-
आज मेरे इस पागल मन को
दादी माँ से
परियों वाली
नन्हीं-मुन्नी चिड़ियों वाली
गुड्डे वाली, गुड़ियों वाली
सात रंग के सपनों वाली
एक कहानी फिर सुननी है

प्रेम की संवेदनाओं को स्पर्श करती पंक्तियों के साथ मीनाक्षी जिजीविषा बड़ी सादगी से कहती हैं-
तुमसे परिचय
जैसे बचपन के खेल-खेल में
ज़िंदगी अचानक
पीछे से पीठ पर हाथ रखे
और धीरे से कान में कहे….
धप्पा….!

संबंधों के वैभत्स्य की ओर इंगित करते हुए रश्मि सानन शेर कहती हैं=
तेरी यादें भुलाना चाहती हूँ
मैं दो पल मुस्कुराना चाहती हूँ

ग़रीबी और भूख के नंगे सच को गायत्री भानु कुछ इस अन्दाज़ में बयाँ करती हैं-
रोटी की लड़ाई
दुनिया की सबसे पहली लड़ाई है
रोटी की लड़ाई
दुनिया की सबसे बड़ी लड़ाई है
रोटी की लड़ाई
दुनिया की सबसे लंबी लड़ाई है

अनुत्तरित प्रश्न में नीरजा चतुर्वेदी अपने मन की पीड़ा को धीरे से कहती हैं-
जब तुम
मुझे छोड़
यहाँ से वहाँ चले गए थे
सच कहती हूँ
तुम्हारे संग
मेरे कितने सावन
चले गए

नारी मन की अनुभूतियों को हौले से अभिव्यक्त करते हुए शशिकांत सदैव ने बेबाक़ी से कहा-
शायद पुरुष
सदा स्वर्ग की कामना करता है
और स्त्री
सिर्फ़ कामना नहीं करती
स्वर्ग बनाने की
क़ोशिश में लगी रहती है

संवेदनाओं के साथ-साथ गुदगुदी और ठहाकों की गूंज भी इन कवियों की रचनाओं में पर्याप्त मात्रा में थी। पुलिसिया भ्रष्ट्राचार पर तन्ज़ करते हुए विनोद विक्रम लिखते हैं-
कॉन्स्टेबल की भर्ती के हमने भी फ़ार्म भरे थे
एक तरह से हमने अपने तन-मन
मृत्यु के नाम करे थे
क्योंकी जिस दिन दौड़ थी हमारी स्पोर्ट्स ग्राउंड में
बेहोश होने लगे थे हम
पहले ही राउंड में
एक बार तो दिल ने कहा-
विनोद! हार जा प्यारे
पर हमको तो दिख रहे थे
ऊपर की कमाई के नोट करारे

वैवाहिक संबंधों के ख़ौफ़ को बयाँ करते हुए ब्रजेश द्विवेदी कहते हैं-
भैया अभी कुँवारे हो तो रहना अभी कुँवारे
तुम हो ऐसे क्वारे जिस पर दुनिया डोरे डाले

दीपक सैनी भी हास्य के माध्यम से राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार को आड़े हाथ लेते हैं और नेता चालीसा की शुरुआत कुछ इस तरह करते हैं-
निज चरणों से नित्य आपने, लात देश को मारी
एक हाथ से वोट बटोरे, दूजे से चलाई आरी

राष्ट्रभक्ति की भावना से ओत-प्रोत गीत में प्रीति विश्वास भारत की वंदना करती हुई नज़र आती हैं-
कण-कण तीर्थ करोड़ों बसते, क्षण-क्षण पर्व जहाँ है
कोई बतलाए दुनिया में ऐसा स्वर्ग कहाँ है

इसी भावना को अरुण अद्भुत ने कुछ ऐसे व्यक्त किया है-
शत्रुओं का सदा मुँह तोड़ देती है जवाब
किंतु मित्र की है मित्र माटी मेरे देश की
मातृ भू की रक्षा करें, मौत से कभी न डरें
ऐसे देती है चरित्र, माटी मेरे देश की

व्यंग्यपूर्ण शैली में सांस्कृतिक प्रदूषण पर लानत भेजते हुए हरमिन्द्र पाल कहते हैं-
जब मैंने सुना ये गाना
‘जिगर मा बड़ी आग है, बीड़ी जलाना’
तो हैरान हो गया मैं
परेशान हो गया मैं
क्योंकि मैंने तो सुना था
कि जिगर की आग तो देशभक्तों में होती थी
जिन्होंने हँसते-हँसते देश के लिये जान दी थी

भगतसिंह की क़ुर्बानी याद करते हुए कलाम भारती कहते हैं-
भगतसिंह की क़ुर्बानी इतिहास भुला ना पाएगा
और तिरंगा सदियों तक गुणगान भगत का गाएगा

भारत के भविष्य के लिये आशावादी दृष्टिकोण रखने वाले अमरनाथ आकाश गीत लिखते हैं-
एक दिन भारत फिर से सोने की चिड़िया कहलायेगा
अपनी खोई गरिमा को, फिर से वापस पा जायेगा

कुल मिलाकर पूरा संकलन ही श्रेष्ठ रचनाओं का एक पुलिंदा है।

-विवेक मिश्रा

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तबियत का शायर

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कृति- चौमास
विधा- कविता
कवि- राजगोपाल सिंह
प्रकाशक- अमृत प्रकाशन
मूल्य- 100 रु.

गीत की लय और ग़ज़ल की नाज़ुक बयानी के महीन धागे जहाँ बिना कोई गाँठ लगाए एक-दूसरे से जुड़ते हैं, वहीं से उठती हैं कवि राजगोपाल सिंह की रचनाएँ। गीत और ग़ज़ल के पिछले चार दशक के सफ़र में राजगोपाल सिंह ऐसे बरगद के पेड़ हैं, जिनकी छाँव में हरेक गीत और ग़ज़ल सुनने वाला और कहने वाला ज़रूर कुछ पल सुस्ता कर आगे बढ़ा है।
यूँ तो ग़ज़ल कहने के बारे में बहुत-सी बातें कही और सुनी जाती हैं पर यहाँ मैं वह कहना चाहूंगा जो निश्तर ख़ानकाही ग़ज़ल के विषय में कहते हैं। वे कहते हैं कि जब भी कोई ग़ज़ल संग्रह मेरे हाथ में आता है तो मैं सबसे पहले ग़ज़लों के लिए प्रयोग किए गए क़ाफ़िए देखता हूँ और जानने की क़ोशिश करता हूँ कि ग़ज़लकार क़ाफ़िए को अपना ख़याल दे रहा है या ख़ुद क़ाफ़िए के आगे हाथ जोड़े खड़ा है।
अगर इस नज़रिए से राजगोपाल जी की ग़ज़लें सुनी जाएँ तो वे हमें एक ऐसे सफ़र पर ले जाती हैं जिसका अगला स्टेशन कौन-सा होगा; ये अंदाज़ा हम नहीं लगा सकते। या यूँ कहें कि किसी फ़कीर का फ़लसफा है उनकी ग़ज़लें, जो ज़मीन से आसमान को, साकार से निराकार को जोड़ती चलती हैं। उनकी ग़ज़लों में महज़ क़ाफ़िया पैमाई नहीं है। उनकी ग़ज़लें गहरे ख़यालों और सहज क़ाफ़ियों से एक ऐसी झीनी-सी चादर बुनती हुई चलती हैं, जिसको ओढ़ लेने पर दुनिया की हक़ीकत और खुलकर उजागर होती हैं-

मौन ओढ़े हैं सभी, तैयारियाँ होंगी ज़रूर
राख के नीचे दबी, चिन्गारियाँ होंगी ज़रूर
आज भी आदम की बेटी, हंटरों की ज़द में है
हर गिलहरी के बदन पर धारियाँ होंगी ज़रूर

या

यह भी मुमकिन है ये बौनों का नगर हो इसलिए
छोटे दरवाज़ों की ख़ातिर अपना क़द छोटा न कर

राजगोपाल सिंह जी ने ग़ज़ल को नए तेवर से सजाया भी, सँवारा भी और ज़रूरत पड़ने पे बड़ी बेतक़ल्लुफ़ी से इसे अपने मुताबिक़ ढाला भी-

गिर के आकाश से नट तड़पता रहा
सब बजाते रहे जोश में तालियाँ
मेरे आंगन में ख़ुशियाँ पलीं इस तरह
निर्धनों के यहाँ जिस तरह बेटियाँ
मैं हूँ सूरज, मेरी शायरी धूप है
धूप रोकेंगी क्या काँच की खिड़कियाँ

उनके लेखन में हमारी संस्कृति की विरासत है। समाज में व्याप्त रूढ़ियों से जूझते आदमी की घुटन है और बुराई के सामने सीना तानकर खड़े होने का हौसला है। उनकी ग़ज़लों में कहीं किसी हसीं हमसफ़र से हाथ छूट जाने की कसक है, तो कहीं मन की गहराइयों में करवटें लेते और बार-बार जीवन्त हो उठते गाँव के नुक्कड़ हैं, गाँव की गलियाँ हैं, पुराना पीपल है, बूढ़ा बरगद है और माँ के आँसुओं से नम उसका ममता से भरा आँचल है। और हम सबके साथ अपने दर्द को मुस्कुराते हुए कहने का अनोखा अंदाज़ भी है-

वो भी तो इक सागर था
एक मुक़म्मल प्यास जिया
अधरों पर मधुमास रही
आँखों ने चौमास जिया

‘चौमास’ राजगोपाल सिंह जी की ग़ज़लों, गीतों और दोहों का एक ऐसा संग्रह है जिसमें चुन-चुन कर उनकी वे रचनाएँ रखी गई हैं जो शिल्प, कथ्य और भाव की दृष्टि से श्रेष्ठ हैं और जन गीतों का दर्जा पा चुकी हैं। एक आम आदमी की पीड़ा को उसी के शब्दों में कह कर राजगोपाल सिंह जी आज सच्चे जनकवि बनकर सामने खड़े हैं-

न आंगन में किसी के तुलसी
न पिछवाड़े नीम
सूख गए सब ताल-तलैया
हम हो गए यतीम

उनके गीत ढहती भारतीय संस्कृति की विरासत को बचाकर गीतों में संजोकर आने वाली पीढ़ी के सामने एक ऐसा साहित्य रखने की उत्कंठा से भरे हैं, जो सदियों तक भारत के जनमानस पर छाया रहेगा। और एक समय कहा जाएगा कि यदि सच्चा गाँव, सच्चा भारत, सच्चे रिश्तों को देखना हो, उनकी सौंधी गंध पानी हो, तो एक बार जनकवि राजगोपाल सिंह की रचनाओं को पढ़ो। उनकी दुनिया में विचरण करो, तुम्हें भारत की सच्ची झाँकी दिखाई देगी।

-विवेक मिश्रा

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पुनर्जन्म की वैज्ञानिक पुष्टि

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कृति- बोर्न अगेन
विधा- शोध
लेखक- डॉ वाल्टर सेमकिव
अनुवादक- राजेन्द्र अग्रवाल एवं डॉ संध्या गर्ग
प्रकाशक- रिटाना बुक्स
मूल्य- 195/-

मृत्यु मनुष्य के लिये हमेशा ही एक अनबूझ पहेली रही है। मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है, क्या मरने के बाद आत्मा दोबारा जन्म लेती है, क्या मनुष्य अपने कर्मों का फल भोगने के लिये बार-बार जन्म लेता है और क्या किसी मनुष्य को अपना पिछला जन्म याद रह सकता है- ऐसे ही न जाने कितने प्रश्न हमारे मानस् में कुलबुलाते रहते हैं।
ऐसे ही तमाम प्रश्नों का हल खोजती एक पुस्तक है बोर्न अगेन। अमरीकी चिकित्सक डॉ वॉल्टर सेमकिव ने विश्व के तमाम देशों के ऐसे मामलों पर शोध किया है, जिनमें किसी को उसके पिछले जन्म की स्मृतियाँ याद हों। भारत की प्रसिद्ध राजनैतिक, सिने और अन्य हस्तियों के पूर्वजन्मों की भी लेखक ने खोज की है। मूलतः अंग्रेज़ी भाषा में लिखी गयी इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद राजेन्द्र अग्रवाल और डॉ संध्या गर्ग ने किया है।
इस पुस्तक में हिंदी पाठकों को पुनर्जन्म के सिद्धांत और उसके प्रमाणों की जानकारी तो मिलेगी ही, साथ ही साथ भारत और पाकिस्तान में जन्मीं जानी-मानी हस्तियों के पूर्वजन्मों के विषय में भी रोचक और अश्चर्यजनक तथ्य जानने को मिलेंगे।
एपीजे अबुल कलाम, अमिताभ बच्चन, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, शाहरुख़ ख़ान और बेनज़ीर भुट्टो समेत कई हस्तियों के पूर्व जीवन की प्रामाणिक कहानी इस पुस्तक में आप पढ़ सकेंगे। जिन लोगों पर लेखक ने शोध किया है उनके चित्रों, आदतों, सोच और जीवनशैली में समानता के प्रमाण भी पुस्तक में समाविष्ट किये गये हैं।
लेखक ने सिद्ध किया है कि आत्माएँ एक जन्म से दूसरे जन्म तक लिंग, राष्ट्रीयता और धर्म परिवर्तन भी करती हैं। लेखक का मानना है कि यदि इस तथ्य को सभी जान और मान लें तो शायद इस धरती पर भौगोलिक विविधता, धर्म, भाषा और अन्य भेद-भाव को समाप्त करने में सहायता मिल सके।
पुस्तक पठनीय होने के साथ-साथ संग्रहणीय भी है।

-चिराग़ जैन

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