पुस्तक-समीक्षा

एक बड़े सामाजिक सरोकार की कविताएं

कृति- अनचाही
विधा- कविता
कवि- मिथिलेश जैन
प्रकाशन- मेधा बुक्स, नवीन शाहदरा, दिल्ली
मूल्य- रु 250/-

हाल ही में श्रीमती मिथिलेश जैन का कविता संग्रह अनचाही (2012) सामने आया है। इस संग्रह की 100 से ऊपर समस्त कविताएँ कन्या भ्रूण हत्या को केन्द्र में रखकर लिखी गई हैं। एक ही थीम पर, वह भी एक बड़े सामाजिक मुद्दे को लेकर लिखी गईं इस तरह की संवेदनात्मक कविताएँ कम से कम मुझे तो पहली बार पढ़ने को मिली हैं।
‘अनचाही’ -जैसा कि संग्रह के शीर्षक से ही व्यक्त है, परिवार के न चाहने के कारण जन्म से वंचित की जाने वाली कन्या-भ्रूण का हृदय को उद्वेलित कर देने वाली आवाज का नाम है। जन्म ले भी ले तो परिवार और समाज के लिए भी वह ‘अनचाही’ ही बनकर रह जाती है। इस पीड़ा को भी ये कविताएँ पूरी संवदेना के साथ मुखर करती हैं। सवाल केवल अस्मिता का नहीं है – अस्तित्व का है। जीवन का है। संग्रह की प्रथम कविता ही अजन्मी कन्या के अपनी माँ को सम्बोधित है, जो बेटों की चाहत में अपनी बलि न देने की निरीह पुकार है। (माँ! मेरी बलि न दो) यह मार्मिक आवाज़ मानो कविता के पाठक/पाठिका को रह-रहकर सुनाई देती है – माँ प्यार से आँचल में खिलने का अवसर दो।
यह स्वर कवयित्री ने अपनी अनेक कविताओं में अलग-अलग प्रसंगों, संदर्भो और स्थितियों में मुखरित किया है। यह कोमलतम स्वर जैसे अजन्मी कन्या की धड़कनों से आ रहा हो। यह इन कविताओं के प्रभाव की शक्ति भी बन गया है। कवयित्री जहाँ ‘कचरे के डिब्बे’ के पास होकर गुज़र जाने वाली भीड़ को देखकर आहत है, कि कोई उस कचरे का डिब्बे में डाल दी गई कन्या भ्रूणों की ओर ध्यान नहीं दे रहा; वहीं निरर्थक हो चले – ‘बेटी बचाओ, बेटी बचाओ’ के शोर के बीच भोंथरी हो गई संवदेनाओं और ऐसे नारों के खोखलेपन की ओर हमारा ध्यान खींचती है। (आज का यक्ष प्रश्न, पृष्ठ 15) वे ‘बेख़बर अनजान दौड़ती दुनिया’ को ‘आने वाले चक्रवात की आहट’ से सचेत करती हैं। और इसका प्रतिफलन उनकी कई कविताओं में होता है, जैसे-कहाँ गई ये गुमशुदा बेटियाँ, बेटियाँ मिटाओगे तो मिट जायेगी ये धरा, परिदृष्य-2050, राखी का त्योहार इतिहास हो जाएगा आदि-आदि।
एक कन्या आख़िर हमसे क्या चाहती है? प्यार, दुलार, जीने का अधिकार, घर-परिवार और समाज में अपनी सम्मानजनक उपस्थिति… अपनी पहचान…। इन पंक्तियों में मिथिलेश जी ने इतनी मार्मिक बात कही है-
न कुल-दीपक बनने की चाहत / न उत्ताराधिकार की अभिलाषी / हृदय वेदना सुना रही हूँ / माँ! मैं तेरी राजदुलारी! माँ! मैं तेरी राजदुलारी, पृष्ठ 24
और इस कविता का अंत होता है- हम रह जायेंगी बस / कहानी और विचारों में / आने वाला कल ढूंढेगा / हम को चाँद-सितारों में।
वे नारी की उपलब्धियों को भी रेखांकित करती हैं, उसकी शक्ति को भी। उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या के विविध आयामों को उद्धाटित किया है, जो इस संग्रह की महती उपलब्धि है। नारी को देवी मानने की समाज की चालाकी को, नारी-द्वारा ही कन्या-भ्रूण हत्या के कृत्य को, इसी तरह के अन्य घटकों को उद्धाटित करते हुए वे आज की आधुनिक स्त्री को नयी चेतना देती है, कि कन्या भ्रूण हत्या से बचें। इसके लिए स्वयं नारी को ही निर्णय लेना होगा – तब बनेगी ‘कम्लीट फैमिली’ (पृष्ठ 128)। यह कविता पति के हृदय का परिवर्तन भी कर देती है, पत्नी के निर्णय से। उनकी कविताओं में नन्हीं अजन्मी कन्या ही माँ को सही निर्णय लेने, रूढ़ियों को साहसपूर्वक तोड़ने और अपने को इस संसार में आने के लिए प्रेरित करती है। यथा –
ठुकरा दो वो सब कुरीतियाँ / जड़ता से ग्रसित समाज की / बाधक जो मेरे /  जीने का अधिकार की। थामो नहीं मेरी गति, पृष्ठ 18
अथवा
माँ! / तुम क्यों नहीं तोड़ती / भेदभाव की ये दीवार ? (पृष्ठ 20)
अथवा
मुझे दया आती है / तेरी जैसी बुजदिल माँ पर / तू ग़लत सोचती है कि मैं तेरे निबोहरे करूंगी / मैं तो स्वयं ही नहीं आना चाहती / इस भेदभावपूर्ण संसार में …(पृष्ठ 32)
अर्थात् वह नन्हीं-सी धड़कती जान कितनी ही कोमल क्यों न हो, उसका जो स्वर कवयित्री ने सुना है वह कमज़ोर नहीं है। कई कविताओं में मासूम से प्रश्न के एक नन्हें आघात से माँ की पश्चाताप भरी वेदना भी जागृत हो उठती है। उन्होंने अपने भीतर की पीड़ा को इन कविताओं में प्रतिष्ठित कर समाज को दिशा देने की सफल चेष्ठा की है। यहाँ एक स्त्री और पुरूष प्रधान समाज आमने-सामने हैं। ये कविताएँ निश्चय ही स्त्री जीवन की और उस ब्याज से स्वस्थ समाज की पक्षधर हैं।
अंत में एक कविता की ये पंक्तियां, जो मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत प्रभावित करती हैं-
जब एक माँ / अपनी बेटी की आँखों में / अपना प्रतिबिम्ब देखती है / तब बेटी भी / उसकी आँखों में अपने को / प्रतिबिम्बित होते देख लेती है / और शुरू हो जाता है / युगों-युगों से चला आ रहा / एक सिलसिला / माँ-बेटी के बीच / एक अदृश्य बंधन का। (आकाशवृत्ता, पृष्ठ 170)

-डॉ. हरीमोहन
निदेशक
क मु हिन्दी तथा भाषा विज्ञान विद्यापीठ
आगरा
मो:- 09412256333


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