सर न झुकाया, हाथ न जोड़े
बेशक़ हम पर बरसे कोड़े

लाख परों को कतरा उसने
ख़ूब क़फ़स हमने भी तोड़े

हार गए ना दिल से आख़िर
दौड़े लाख ‘अक़ल के घोड़े’

हम वो एक कथा हैं जिसने
लाखों क़िस्से पीछे छोड़े

हमसे मत टकराना बबुआ
हमने रुख़ तूफ़ां के मोड़े

© नरेश शांडिल्य