वक़्त लहू से तर लगता है
इस दुनिया से डर लगता है

इंसानों के धड़ के ऊपर
हैवानों का सर लगता है

बाज़ के पंजों में अटका वो
इक चिड़िया का पर लगता है

रिश्ते-नाते पलड़ों पर हैं
बाज़ारों-सा घर लगता है

जितना ज़्यादा सच बोलें हम
उतना ज़्यादा कर लगता है

© नरेश शांडिल्य