बिकते समय जिन्हें रोने तक की आज़ादी नहीं मिली थी
अपना दर्द भूल जाता हूँ, जब वे नयन याद आते हैं

मैंने दर्द सहा जीवन भर, दुख की हर करवट देखी है
सुख के नाम, समय के माथे पर केवल सिलवट देखी है
पर जो सात बार वेदी पर घूमे केवल लाचारी में
अपना दुख छोटा लगता है, जब वे चरण याद आते हैं

इस हद तक अपमान सहा है, बदले की इच्छा जागी है
अथवा रो-रोकर मरघट से, अपने लिए शरण मांगी है
पर जो पत्थर के पाँवों पर, केवल पड़े-पड़े मुरझााए
सब अपमान भूल जाता हूँ, जब वे सुमन याद आते हैं

मैंने ज्योति जलाई लेकिन, बदले में जो पाया तम है
मेरे तप की तुलना में यह, पीड़ा भी तो बेहद कम है
पर जो सदा उपेक्षित बनकर, बन्द रहे तम की मुट्ठी में
अपना ग़म हल्का लगता है, जब वे रतन याद आते हैं

© रामावतार त्यागी