यही है दर्द मेरा, लोग मुझको कब समझते हैं
मैं शातिर हूँ नहीं इतना कि, जितना सब समझते हैं

ज़माने को समझने में हमारी उम्र गुज़री है
मियां, हम आपकी हर बात का मतलब समझते हैं

जमूरा भूख से जब पेट पकड़े छटपटाता है
अजब हैं लोग उसको भी महज करतब समझते हैं

तुम्हारी हर अदा जैसे कि मुझसे बात करती है
तुम्हारी आँख की बोली को मेरे लब समझते है

यकीं मानो न मानो तुमसे ही क़िस्मत हमारी है
खुदा भी जानता है हम तुम्हें ही रब समझते हैं

© दीपक गुप्ता