बचपन रेल-वेल-खेल में निकल गया
चढ़ती जवानी किसी ख्वाब में चली गई
कुछ पल सजने-सँवरने के नाम गए
और कुछ झूठे हाव-भाव में चली गई
सही व ग़लत के मुग़ालते में गई कुछ
कुछ भावनाओं के बहाव में चली गई
कुछ लेन-देन खाने-पीने में निकल गई
और बाक़ी ज़िन्दगी हिसाब में चली गई

© चरणजीत चरण