ओ हमारी यात्रा के मौन सहचर,
मैँ न दे पाया तुम्हे दो पल तुम्हारे।

याद है मुझको मरुस्थल की कहानी,
दूर तक दिखता न था दो बूँद पानी,
तब तुम्हारे लोचनोँ से बल मिला था,
बन गये थे नैन गंगाजल तुम्हारे।

याद है मुझको हवा की वह प्रबलता,
छोड़ आये थे कहीँ हम नीड़ जलता,
देखते थे लोग सारे मौन होकर,
जल रहे थे प्रश्न मेरे हल तुम्हारे।

लौट आये हम उसी नदिया किनारे,
दूर तक बिखरे हुये हैँ सब सितारे,
मन क्षितिज पर बिजलियाँ कौँधी अचानक,
आ गये भेजे हुये बादल तुम्हारे।

-ज्ञान प्रकाश आकुल