रचनाएँ

नज़रिया

कुलदीप आज़ाद

बस समंदर में समाने की सज़ा मुझको मिली
खो गया अस्तित्व मेरा, हुनर दरिया ना रहा
मैं वही; दर्पण जिसे तुमने कहा था एक दिन
अब तुम्हारे देखने का वो नज़रिया ना रहा

ज़िंदगी को अपनी शर्तों पे मैं क्या जीने चला
जी सकूंगा इस ज़माने में, भरोसा ना रहा
मैं सिकंदर-सा -यही तुमने कहा था एक दिन
अब तुम्हारे देखने का वो नज़रिया ना रहा

रोशनी कम होने न पाए तुम्हारी राह की
-बस इसी कोशिश में मेरे घर उजाला ना रहा
मैं वही; दीपक जिसे तुमने कहा था एक दिन
अब तुम्हारे देखने का वो नज़रिया ना रहा

मेरी आँखों में तुम्हारे ख़्वाब, तुम में मैं शुमार
जाने क्यों दरम्यां अपने वो सिलसिला ना रहा
मैं वही; धड़कन जिसे तुमने कहा था एक दिन
अब तुम्हारे देखने का वो नज़रिया ना रहा

2 Responses to “नज़रिया”

  1. 1
    deep Says:

    kuldeep mayry bary mau doosray kya soochtay hai yah unka visay hai. mayra visay hai ki may apnay baray may kya sochta hoo.

  2. 2
    Kuldeep Azad Says:

    Hmmmmmmm,

    Jindagi jeene ke liye

    kai baar Unn logon ko ye Bataana jaroori hota hai
    jo baar baar ye Tohmatt lagaate hain ki tum Badal gaye ho ???

    Ki main nahi Najariya badla hai tumhaara
    Duniya dekhne ka …..
    Mujhe dekhne ka ……..

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