हमने तो बस ग़ज़ल कही है, देखो जी
तुम जानो क्या ग़लत-सही है, देखो जी

अक़्ल नहीं वो, अदब नहीं वो, हाँ फिर भी
हमने दिल की व्यथा कही है, देखो जी

सबकी अपनी अलग-अलग तासीरें हैं
दूध अलग है, अलग दही है, देखो जी

ठौर-ठिकाना बदल लिया हमने बेशक़
तौर-तरीक़ा मगर वही है, देखो जी

बदलेगा फिर समां बहारें आएंगी
डाली-डाली कुहुक रही है, देखो जी

© नरेश शांडिल्य