ना वो सावन रहा
ना वो फागुन रहा
ना वो आँखों में सपने सलौने रहे
ना वो आंगन रहा
ना वो बचपन रहा
ना वो माटी के कच्चे खिलौने रहे

है ज़माने की बदली हुई दास्तां
ऐसे मौसम में जायें तो जायें कहाँ
हर तरफ आग के शोले दहके हुए
दिख रही है हमें बस ख़िज़ाँ ही ख़िज़ाँ
ना वो मधुबन रहा
ना वो गुलशन रहा
ना वो मख़मल के कोमल बिछौने रहे

मन की बंसी का सुर आज सहमा हुआ
गुनगुनाता पपीहा भी तनहा हुआ
है ज़माने की हर शय बदलती हुई
भीड़ ज्यों-ज्यों बढ़ी मन अकेला हुआ
ना वो बस्ती रही
ना वो मस्ती रही
ना वो पहले से अब जादू-टोने रहे

आज सावन के झूले नहीं दीखते
फूल सरसों के फूले नहीं दीखते
धनिया, होरी के संग जो जिये उम्र भर
लोग वो बिसरे-भूले नहीं दीखते
ना वो पनघट रहा
ना वो घूंघट रहा
ना रंगोली, ना डोली, ना गौने रहे

फट रहे हैं खिलौनों में बच्चों के, बम
बढ़ रहे हैं धरा पर सितम ही सितम
हर ख़ुशी को मिला आज वनवास है
आँसुओं से भरी भीगी पलकें हैं नम
ना रही वो हँसी
ना रही वो ख़ुशी
ना वो महके हुए दिल के कोने रहे

ना वो दादी औ’ नानी की बानी रही
मीठी बानी की ना वो कहानी रही
आजकल के बदलते नये दौर में
ना वो सपनों में परियों की रानी रही
ना वो पिचकारियाँ
ना वो किलकारियाँ
ना वो माथे पे काले दिठौने रहे

© प्रवीण शुक्ला