क्या बताऊँ मैं स्वयं को

क्या बताऊँ मैं स्वयं को

कनकप्रभा

क्या बताऊँ मैं स्वयं को भी नहीं पहचानती हूँ

घुट रहीं साँसें खुले मैदान में जब
भीड़ में कैसे उन्हें सहला सकूंगी?
कूल ने मझधार में मुझको डुबोया
तब भला मझधार से क्या पा सकूंगी?
दूज क्या मैं पूर्णिमा को भी अंधेरी मानती हूँ

फूल के अभिधान से ही चुभन होती
शूल पर कैसे टिकेंगे पाँव मेरे
सूर्य को सिर पर करूंगी सहन कैसे
चू पड़ा तन से पसीना जब सवेरे
शून्य में अहसास जो होता उसे कब जानती हूँ?

One Response to “क्या बताऊँ मैं स्वयं को”

  1. 1
    jandunia Says:

    शानदार पोस्ट

Leave a Reply