साथ सब ना चल सकेंगे, ये तो हम भी जानते हैं
लोग रस्ते में रुकेंगे, ये तो हम भी जानते हैं
दूसरों के आँसू अपनी, आँख से जो भी बहाए
वो हमारे साथ आए, भीड़ चाहे लौट जाए

दूसरों को जानते हैं, ख़ुद को पहचाना नहीं है
बात है छोटी मगर, सबने इसे माना नहीं है
बौने क़िरदारों को अक़्सर होता है क़द का गुमां
क़द किसी का नापने का भीड़ पैमाना नहीं है
हम तो बस उस आदमी के साथ चलना चाहते हैं
जो अकेले में कभी ना, आइने से मुँह चुराए
वो हमारे साथ आए, भीड़ चाहे लौट जाए

आवरण भाने लगे तो सादगी का अर्थ भूले
अर्थ की चाहत में पल-पल ज़िन्दगी का अर्थ भूले
छोटी ख़ुशियाँ द्वार पर दस्तकें तो लाईं लेकिन
हम बड़ी ख़ुशियों में छोटी हर ख़ुशी का अर्थ भूले
दूसरों की ख़ुशियों में जो ढूंढकर अपनी ख़ुशी को
भोली-सी मुस्कान हर दम अपने होठों पर सजाए
वो हमारे साथ आए, भीड़ चाहे लौट जाए

हर किसी को ये भरम है, साथ है दुनिया का मेला
पर हक़ीक़त में सभी को होना है इक दिन अकेला
ज़िन्दगी ने मुस्कुरा कर बस गले उसको लगाया
जिसने भी ज़िदादिली से ज़िंदगी का खेल खेला
दुनिया में उसको सभी मौसम सुहाने लगते हैं
मौत की खिलती कली पर, भँवरा बन जो गुनगुनाए
वो हमारे साथ आए, भीड़ चाहे लौट जाए

© दिनेश रघुवंशी