सफ़र में जब कभी तेरी कमी महसूस होती है
जिगर में दर्द ऑंखों में नमी महसूस होती है

ख़ुदाया दुश्मनी जाने असर अंदाज़ कितनी है
मगर मैं जानता हूँ दोस्ती महसूस होती है

बड़ी उलझी हुई है सच, मगर जब काटता हूँ मैं
गिरह कोई तो ये दुनिया नई महसूस होती है

किसी का बोलना मीठा जिगर को ख़ार लगता है
किसी की बात कड़वी भी सही महसूस होती है

कभी महसूस होता है कि जैसे बात कल की है
कभी गुज़री घड़ी हमको सदी महसूस होती है

फ़ना हो तो नहीं सकता मगर ये है कमी तेरी
कभी होती नहीं अक्सर कभी महसूस होती है

मसाइल ज़िन्दगानी के ‘चरन’ अपनी जगह पर हैं
किसी के प्यार की शिद्दत अभी महसूस होती है

© चरणजीत चरण