पहलू बदल के पूछते हैं राहबर से हम
गाड़ी खड़ी है जाम में निकलें किधर से हम

संजीवनी की खोज सफल हो चुकी है अब
कमतर दिखाई देंगे कुछ अपनी उमर से हम

बस्ती के हर मकान की बुनियाद हिल चुकी
अब कितने खाको-खून पे निकलेंगे घर से हम

जाओगे दूर हमसे तो जाओगे तुम कहां
रख लेंगे बांधकर तुम्हें अपनी नज़र से हम

जिसपर किसी के पांव पड़े हों न आजतक
गुजरेंगे बार-बार उसी रहगुजर से हम

जिस रोज हमपे खुल गया असरारे-ज़िंदगी
दुनिया को देखने लगे अपनी नज़र से हम

कोई खुली किताब सा आया है सामने
पन्ने पलट के पढ़ लें चाहे जिधर से हम

देवेंद्र गौतम