नहीं चाहा था मैंने
अपनी माँ जैसा होना
उसे देखती थी जब मैं
दिन-रात काम करते
सीते-पिरोते
मन की इच्छाओं को मन में दबाए
दूसरों की इच्छाओं के
यज्ञ में होम होते

डर के कारण
आँसू भी नहीं बहते थे उसके
केवल भिगो देते थे
ऑंखों के कोरें

तब मैंने सोचा था-
नहीं! माँ जैसा नहीं होना है
कुछ अलग दिखना है
कुछ अलग करना है

और अब
इतने बरस जीने के बाद
जीवन से समझौता करते-करते
जब थक चुकी हूँ मैं
तो लगता है कि
जो किए थे प्रयत्न
वे तो केवल रंग थे
जिनसे सजाया था
स्वयम् को
बाकी मिट्टी तो वही थी
फिर उससे
बन भी कैसे सकता था
कोई नया खिलौना

© संध्या गर्ग