मेरी सब चाहों ने अब सन्यास ले लिया

मेरी सब चाहों ने अब सन्यास ले लिया

कनकप्रभा

मेरी सब चाहों ने अब सन्यास ले लिया

पलकों की छाया में जो सपने पलते थे
तम के पंथी की चाहों से टूट गए वे
जिनके साथ चले थे बीहड़ पथ पर निर्भय
पता नहीं सब साथी कब से छूट गए वे
प्यास अधर की मुझे ले गई मझधारा में
लेकिन मन के माँझी ने विश्वास खो दिया

नीर गगन से बरसा था सौ-सौ धारा में
घट भी टूट गया बूंदों की आघातों से
मरहम से जल उठे घाव रिसते ये मन के
वरी कालिमा ही मैंने हँसती रातों से
भीगी साँसों को जब-तब पुचकारा लेकिन
सुधा-सिंधु पर जाकर मैंने गरल पी लिया

3 Responses to “मेरी सब चाहों ने अब सन्यास ले लिया”

  1. 1
    संगीता पुरी Says:

    वाह .. बहुत बढिया !!

  2. 2
    suman 'meet' Says:

    bahut sundar………

  3. 3
    suman 'meet' Says:

    khoob likha hai

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